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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात

Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)

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DevanagariHindipublished811 pages

Page 313 of 811

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Page 313

सर्गः १ ] जन्मकाण्डम् २९७


गलन्मधूककुसुमैर्धरायापधरं हरम् । स्वहस्तमुक्तमुक्ताभिरर्चयन्तमिवानिशम् ॥६३॥
सर्जार्जुनाम्रैर्बीजैश्च व्यजनैर्वीज्यमानवत् । नारिकेलैः सखर्जूरैर्धृतच्छत्रमिवांबरैः ॥६४॥
अमदैः पिचुमन्दैश्च मंदारैः कोविदारकैः । पाटलार्तिन्तिणीधौटाशाखोटैः करहाटकैः ॥६५॥
उद्दण्डैरपि सेहुण्डैर्गुंडपुष्पैर्विराजितम् । बकुलैस्तिलकैश्चैव तिलकांकितमस्तकम् ॥६६॥
अक्षैः प्लक्षैः सल्लकीभिर्देवदारुहरिद्रुमैः । सदाफलसदापुष्पवृक्षवल्लिविराजितम् ॥६७॥
एलालवंगमरिचकुलंजनवनावृतम् । जम्ब्वाम्रातकभल्लात शेलुश्रीपर्णिपर्णितम् ॥६८॥
शाकशखवनं रम्यं चन्दनै रक्तचन्दनैः । हरीतकीकर्णिकारधात्रीवनविभूषितम् ॥६९॥
द्राक्षावल्लीनागवल्लीकर्णवल्लीशतावृतम् । मल्लिका यूथिकाकुंदमदयन्तीसुगंधितम् ॥७०॥
तुलसीवृक्षषंडैश्च शिवत्यगस्तिद्रुमैर्युतम् । भ्रमद्भ्रमरमालाभिर्मालतीभिरलंकृतम् ॥७१॥
अलिच्छलागतं कृष्णं गोपी रंतुमनेकशः । सुगंधवातं सुखदं कामसञ्जनकं परम् ॥७२॥
नानामृगगणाकीर्ण नानापक्षिनिनादितम् । नानासरित्सरःश्रोतः पल्वलैः परितो वृतम् ॥७३॥
उत्सृजतमिवार्थं वै रत्नपुष्पैस्तितस्ततः । केकि केकारवैर्दूरात्कुर्वन्तं स्वागतं किल ॥७४॥
एतादृशं सुपवनं जानकी तद्ददर्श सा । तुष्टाऽभूद्दर्शनेनैव विचचार स्थितस्ततः ॥७५॥

इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये
जन्मकांडे नाम प्रथमः सर्गः ॥ १ ॥


था कि मानो शिवजी धरणीका रूप धारण किये हुए हैं और अपने ही हाथसे अपनेपर मोतियोंकी वर्षा कर रहे हैं। ६२ ॥ ६३॥ सर्ज, अर्जुन, बीजपूर आदिके वृक्षोंसे ऐसा मालूम होता था कि वे सब बगीचेको पंखा झल रहे हैं। नारियल तथा खजूरके वृक्ष छत्र धारण करनेवाले सेवक जैसे थे। अमद, पिचुमन्द, मन्दार, कोविदार, पाटल, तिन्तिणी, धोंटा, शाखोट, करहाटक, ऊँचे डण्डेवाले सेहुंड और गुंडहूलक वृक्ष भी उस बगीचेमें यत्र-तत्र लगे हुए थे। बकुल और तिलकके वृक्ष उस बगीचेके मस्तकपर तिलकके समान मालूम पड़ते थे ॥ ६४-६६ ॥ अक्ष, प्लक्ष, सल्लकी, देवदारु, हरिद्रुम, सदाफल, सदापुष्प और वृक्षवल्ली आदिके वृक्ष भी उस बगीचेमे लगे हुए थे ॥ ६७ ॥ इलायची, लौंग, मरिच तथा कुलंजनके वृक्षोंसे वह समस्त बगीचा भरा हुआ था। जामुन, आम्र, भल्लातक, श्रीपर्णी आदि वृक्षोंसे उस बगीचेकी रंगीली शोभा देखते ही बनती थी ॥ ६८। शाक तथा शलवनके वृक्षोंसे रमणीक एवं चन्दन, हरीतकी, कर्णिकार, आंवला आदिके वृक्षोंसे वह विभूषित था ॥ ६९ । जिनमें सैकड़ों अंगूरकी लताएं तथा पानकी बेले रमी हुई थीं। मल्लिका, जूही, कुन्द और मदयन्तीके वृक्षोंसे वह बगीचा सुगन्धित हो रहा था ॥ ७० ॥ उसमें कितने ही तुलसी, सहिजन तथा अगस्तके वृक्ष लगे हुए थे जिनपर भौंराकी श्रेणी चक्कर काट रही थी, ऐसी मालतीके वृक्षोंसे वह अलंकृत था ॥ ७१ ॥ जिस समय मालतीके समीप भौंरा आता था, तब देखनेवालेके हृदयमें यह उत्प्रेक्षा होती थी कि मानो श्रीकृष्ण गोपियोंके साथ विहार करनेके लिए आये हैं ॥ ७२ ॥ उस बगीचेमें बहुतसे मृग चोकड़ियां भरा करते थे, विविध प्रकारके पक्षी बोलते रहते थे, कितनी ही नदियों तालाबों, स्रोतों तथा गडहोंसे वह बगीचा घिरा हुआ था ॥ ७३ । बगीचेके वृक्षोंसे गिरे हुए फूल किसी दानीकी धनराशिके समान लगते थे। मयूरोंकी आवाजसे ऐसा मालूम पडता था कि मानों वह बगीचा अपने यहाँ आनेवालोंका स्वागत कर रहा है ॥ ७४ ॥ इस प्रकारके उस सुन्दर उपवनको सीताने देखा । देखते ही उनका चित्त प्रसन्न हो गया और वे इधर उधर घूमने लगीं ॥ ७५ ॥ इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये जन्मकाण्डे पं० रामतेजपाण्डेयकृत'ज्योत्स्ना'भाषाटीकायां प्रथमः सर्गः ॥ १ ॥