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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात

Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)

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DevanagariHindipublished811 pages

Page 31 of 811

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Page 31

सर्गः ३ ]
सारकाण्डम्
१५

तस्य मे जनकाद्य स्वं बलं पार्थिवसंसदि । द्रष्टुमिच्छसि किंन्त्वस्मिन लघुचापे तृणोपमे ॥७०॥
एवं वदन् दशान्यः सन्नद्धो भूत्वा महद्धनुः । गृहीतुं वामहस्तेन चालयामास वै तदा ॥७१॥
न चचाल किंचिच्च तदा दक्षिणमन्कराम् । पुः कृत्वा गृहीतं तच्चालयामास वै पुनः ॥७२॥
न तञ्चचाल तदपि तदाश्चर्येण रावणः । भुजाभ्यां चालयामास तदा चापं चचाल न ॥७३॥
एवं क्रमेण सर्वाभिर्भुजाभिश्चालयन् धनुः । विशद्दोर्भिरंकदेशं चापस्योर्ध्वं चकार सः ॥७४॥
एकोनविंशद्दोर्भिञ्च धृत्वा चैव महद्धनुः । गुणे भूम्यां निपत्तिनं गृहीतुं हि दशाननः ॥७५॥
किंचिद्दुन्वा विनम्रः सदोष्षा जग्राह तं गुणम् । एतस्मिन्नन्तरे तच्च पपात त्वद्धृदये धनुः ॥७६॥
न तद्विशतिभुजामिश्च चचाल हृदयाद्धनुः । तदा सभायामूर्ध्वास्यः पपात स दशाननः ॥७७॥
मुकुटः पतितो भूमौ मुक्तकच्छोऽप्यभूत्तदा । तदा विजहसुः सर्वे सभायां पृथिवीजनाः ॥७८॥
तदा प्राणान्तिकं चासीद्रावणस्य सभांगणे । अक्षीणि भ्रामयामास लालास्येभ्यो विनिर्ययौ ॥७९॥
तदा तं वेष्टयामासुर्मंत्रिणो राक्षसास्तदा । धनुरुत्चालने शक्तास्तेऽभवन्नैव संमदि ॥८०॥
महत्क्रेषु दशत्वः स विष्टमृत्रे तदाऽकरोत् । ततः सभायां जनकः पुनः शङ्कान्वितोऽब्रवीत् ॥८१॥
कोऽपि वीरोऽस्ति भूमौ न किं निर्वीरं हि भूतलम् । चेदस्ति कश्चिन्मदसि तर्हि सोऽद्यसमांगणे ॥८२॥
जीवनदानं करोत्वस्मै दशान्याय नृपाग्रतः । इति वाक्यशराघातभिन्नौ तौ रामलक्ष्मणौ ॥८३॥
ददर्शतुर्गाधिजस्य मुखं तौ स्फुरितभ्रुवौ । विश्वामित्रस्तदा प्राह राम चोत्तिष्ठ राघव ॥८४॥
किमत रावणञ्चाद्य त्वं पश्यामि सभांगणे । जीवयंन् राक्षसेन्द्रं सज्जं कुरु धनूस्मि्वदम् ॥८५॥
तन्मुनेर्वचनं श्रुत्वा तथेत्युक्त्वा स राघवः । तदोत्थायासनाद्वेगात्प्रणनाम मुनीश्वरम् ॥८६॥
निष्कास्य कण्ठाद्वारादीन् कटिं बद्ध्वा तदा प्रभुः । मुकुटादि दृढं कृत्वा शनैः प्राप सभांगणम् ॥८७॥

हो तो भले ही देख लो, किन्तु इस तिनकेके समान हल्के धनुषमे क्या वीरता देखना है ॥ ६३ । ७० ॥ ऐसा कह
कर दशमुख रावणने उस बड़े भारी धनुषको पहिले अपने बायें हाथसे ही हिलाना चाहा ॥ ७१ ॥
लेकिन वह तणिक भी नहीं हिला। तब उसने दाहिने हाथसे पकड़कर हिलाना चाहा, तिसपर भी जब वह
नहीं हिला, तब रावणको बड़ा आश्चर्य हुआ और एक साथ दोनो हाथोंसे उठाना चाहा। फिर तीनसे फिर
चारसे इस प्रकार करते-करते जब बीसो भुजायें ऐक साथ लगा दीं, तब कहीं वह एक ओरसे
कुछ ऊँचा हुआ ॥ ७२-७४ ॥ तब उसने उन्नीस भुजाओंसे उस महान् धनुषको सम्हाला तथा बीसवीं
भुजासे जमीनपर लटकती हुई ताँतको पकड़कर ज्यों ही ऊपरको उठाना चाहा त्यों ही वह धनुष उचटकर
उसकी छातीपर गिर पड़ा ॥ ७४ । ७६ ॥ सब बीसों हाथोने भी रावण उस धनुषको अपनी
छातीपरसे नहीं हटा सका और ऊपर मुख किये पृथ्वीपर धड़ामसे गिर पड़ा ॥ ७७ ॥ उसके सिरका
मुकुट दूर जा गिरा और धोतीकी लांग खुल गयी। यह देख सभाके सब राजे खिलखिलाकर हंस पड़े ॥ ७८ ।
रावण बेचारेके पसीना निकलने लगा, आँखें घूमने लगी और मुखसे लार गिरने लगी ॥ ७९ ॥ उसके सब
मन्त्रियो तथा सैनिकोने आकर घेर लिया, परन्तु उन सबसे भी धनुष नहीं उठा ॥ ८० ॥ पहिने हुए सुन्दर
वस्त्रोम रावणका मलमूत्र निकल पडा रावण जैसे वीरकी यह दशा देख राजा जनकको और भी शंका हुई
और वे घबड़ाकर कहने लगे - ॥ ८१ । क्या कोई भी वीर पुरुष इस भूतलपर नहीं रहा ? क्या पृथ्वी वीरोंसे
शून्य हो गयी ? यदि कोई हो तो इस सभा में राजाओंके सामने रावणको जीवनदान देकर बचाये
उनके इस वाक्रूपबाणोसे पीड़ित होकर राम तथा लक्ष्मण जिनकी भौं हैं क्रोधके मारे फड़क रही थीं,
विश्वामित्रके मुखकी ओर देखने लगे। तब विश्वामित्र बोले- हे राघव खड़े हो जाओ और इस रावणके प्राण
बचाओ । तुम्हारे रहते रावण मर रहा है। सी ठीक नहीं है। इसे बचाकर धनुषको भी सज्जित
करो ॥ ८२-८५ ॥ मुनिके वाक्य सुन तथा बहुत अच्छा कहकर राम तुरन्त आसनसे उठ खड़े हुए और मुनिको
प्रणाम किया ॥ ८६ ॥ उन्होंने गलेमेसे हार आदि आभूषण उतारकर रख दिये, कमरको कस लिया,