श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात
Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)
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Read in contextसर्गः ८ ] विलासकाण्डम् २८५
तुलसीकाष्ठहारैश्च पुष्पहारैरनेकधाः। प्रवालमणिकण्ठाग्रैर्मुक्ताः काञ्चनोद्भवाः ॥२८॥
पदकानि विचित्राणि रत्नमिश्रितयन्त्रितैः। रमाशङ्खात्मदाकारै रत्नरूपविचित्रितान् ॥२९॥
रत्नमाणिक्यसंयुक्तमुकुटैर्निनिषेवितान् । शेषमण्डलमध्यस्थान् प्रतापांश्चेतनावान् च ॥३०॥
अङ्गुलीष्वपि बिभ्रन्तं हस्तयोर्मुद्रिकाः शुभाः। मध्यमण्डलयुक्तांश्च विचित्रा रत्नकैरन्विताः ॥३१॥
रामनामाङ्किताश्चापि पत्रिका उज्ज्वला अपि। सम्मुक्तेहाहेममये कर्णयोः कुण्डले वरे ॥३२॥
बिभ्रन्तं मकुटाग्रस्थानलङ्काराननेकधाः। बिभ्रन्तं मौलिवाऽऽडम्बरं मुकुटं रविविचित्रितम् ॥३३॥
नानामणिममायुक्तं कलशैरपि शोभितम्। मुक्ताप्रवालवैदूर्ययुतं हेममयं वरम् ॥३४॥
एवं गुणवती रामं कोटिसूर्यसमप्रभम्। हेमवर्णं महारम्यं कंजपत्रायतेक्षणम् ॥३५॥
सौमाननं कंजहस्तं दृष्ट्वा तं प्रणनाम सा। तं समुत्थाप्य राघवस्तु सम्यक् सम्पूजितः ॥३६॥
वहुतैरुपहारार्यैः सुप्रीतस्त्वाह राघवः। वरं दत्तं मया तुभ्यं यत्ते मनसि वर्तते ॥३७॥
इति रामवचः श्रुत्वा सा तुष्टा राममब्रवीत्। राम राजीवपत्राक्ष यथेमास्ते सहस्रशः ॥३८॥
दास्यः सन्ति तथा मां त्वमङ्गीकर्तुमर्हसि। इति तद्वचनं श्रुत्वा राघवः प्राह संस्मितः ॥३९॥
कथं त्वं ब्राह्मणी चेत्थं वदस्यद्य शुभानने। मन्मंत्रां कृतमुल्लासात्सन तां नहि वदाम्यहम् ॥४०॥
शृणुष्व त्वं गुणवति कृष्णरूपधरो ह्यहम्। द्वापरे द्वारकायां हि भविष्याम्यन्यजन्मनि ॥४१॥
भजिष्यसि तदा मां त्वं स्त्रीरूपेण न संशयः। सत्राजितो देवशर्मा ते भविष्यति पिता पुनः ॥४२॥
यश्चन्द्रनामा सोऽक्रूरो भविष्यति सखा मम। सत्यभामेति नाम्ना त्वं भविष्यसि प्रिया मम ॥४३॥
तदा कुरुष्व दास्यं मे यत्ते मनसि वर्तते। इति रामवचः श्रुत्वा तुष्टा गुणवती मुहुः ॥४४॥
नत्वा श्रीराघवं सीतां ययौ सा स्वगृहं प्रति। धेरुस्नानानन्तरं सा हरिद्रान्नं ददौ जने ॥४५॥
वे तुलसीके काठकी माला, पुष्पोंकी माला, प्रवाल और मणिकी बनी माला पहने हुए थे। गलेमें विचित्र प्रकारके पदक पड़े थे, जिनमें रत्न और पवित्र... काम किया हुआ था। पद्म, शङ्ख तथा कमलका सा ही उनका आकार था। उनमें जगह जगह रत्न और मणियोंसे जड़े हुए... रामनामपद लिखे हुए थे ॥ २८-३० ॥ दोनों हाथोंकी अँगुलियोंमें सुन्दर अँगूठियाँ पहन व वे भी रत्न तथा माणिक आदिसे जड़े हुए मानों लहलहाते हुए थे ॥ ३१ ॥ उनमें भी रामका नाम लिखा था और वे पत्रिकाओंसे युक्त थीं। रत्न तथा मुक्तासे जड़ित कुण्डल उनके कानोंमें झूल रहे थे। वे मुकुटमें... धारण किये थे ॥ ३२ ॥ ३३ ॥ मुकुटमें विविध प्रकारके जतीक जड़ेहुये होनेसे वह और भी सुन्दर लग रहा था। उसमें भी जगह-जगह मुक्ता-प्रवाल-वैदूर्य आदिका सुन्दर काम बना हुआ था ॥ ३४ ॥ इस तरह करोड़ों सूर्योंके समान तेजस्वी तथा सुवर्णकी भाँति जिनका वर्ण था, कमलनयन समान जिनके नेत्र थे, चन्द्रमाके समान जिनका मुख था और कमलकी भाँति हाथ थे उन रामको गुणवतीने देखा और प्रणाम किया। रामचन्द्रने उसे उठाया और उसने विविध प्रकारके उपचारोंसे रामकी पूजा की ॥ ३५ । ३६ ॥ और भेंट दिये। जिससे राम अतिशय प्रसन्न होकर कहने लगे कि "तुम्हारी जो इच्छा हो सो वर माँग लो" ॥ ३७ ॥ इस प्रकार रामकी बात सुनकर वह बोली—हे राजीवपत्राक्ष राम ! जैसे आपकी ये हजार दासियाँ हैं, वैसे ही मुझे भी अपनी एक दासी बना लीजिए। इसका ऐसा वचन सुनकर मुस्कुराते हुए राम कहने लगे—॥ ३८ । ३९ ॥ तुम ब्राह्मणी होकर ऐसी अशुभ बात क्यों कह रही हो ? यदि तुम्हें मेरी सेवा करनेकी इच्छा है, तो मैं बताता हूँ ॥ ४० ॥ हे गुणवती ! सुनो, द्वापरयुग में कृष्णरूप धारण करके अवतार लूँगा । तब द्वारिकामें तुम मेरी स्त्री होकर इच्छानुसार मेरा सेवा करोगी। इसमें कुछ भी संशय नहीं है। उस समय देवशर्मा यादवधन् सत्राजित तुम्हारा पिता होगा, चन्द्र अक्रूरनामका मेरा प्रिय होगा और तुम सत्यभामा नामकी मेरी पटरानी होओगी