श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात
Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)
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Read in context| २७६ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः ६ |
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दीनानामर्पयत् पश्चात्सख्या शृण्वन् कथाः सुखम् । मन्त्रिभिर्बन्धुभिर्मित्रैर्गोष्ठ्या सदसि प्रभुः ॥ ७१॥
सीताऽपि भोजनं कृत्वा दिव्यलङ्कारमण्डिता । निद्राशालां समासीना सखीभिः परिवेष्टिता ॥७२॥
चकार सारिभिः क्रीडां दासीभिर्वीजिता मुदा । कुर्वन्ती रघुनाथस्य प्रतीक्षां द्वाग्लोचना ॥७३॥
इति श्रीमत्कविकलितरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये यागकाण्डे बलकीर्तिवर्णनं नाम पञ्चमः सर्गः ॥ ५ ॥
षष्ठः सर्गः
( राम तथा सीताकी दिनचर्या )
श्रीरामदास उवाच
अथ रामो बंधुमित्रैर्निद्राशालां ययौ मुदा । स्तुतो बंदिजनाद्यैश्च विवेशैकांतमन्दिरम् ॥ १ ॥
विसृज्य लक्ष्मणादींश्च दासीभिः परिवेष्टितः । ददर्श जानकीं निद्राशालायां रघुनंदनः ॥ २ ॥
साऽपि ज्ञात्वाऽऽगतं रामं सारिक्रीडां विहाय च । प्रत्युज्जगाम गम्भीरं सखीभिर्दू रमुत्सृजन् ॥ ३ ॥
नत्वा रामं करे धृत्वा मञ्चके सन्न्यवेशयत् । दत्त्वा पातुं जलं तस्मै ददौ तांबूलमुत्तमम् ॥ ४ ॥
ततश्चक्रे श्रीरामो निद्रां सीतासमन्वितः दासीभिर्वीजितश्चापि पर्यङ्के रत्नभूषिते ॥ ५ ॥
मुहूर्तमात्रादुत्थाय घूर्णार्थात्कम्पवर्हणा । तस्थौ सीता मंचकादधस्ताद्रामोऽप्यबुध्यत ॥ ६ ॥
दृष्ट्वा समुत्थितं रामं दत्त्वा पातुं जलं पुनः । ददौ सीताऽथ तांबूलं राघवायातिहर्षिता ॥ ७ ॥
रामदास्यस्तथा रामं वीजयामासुरादरात् । केकिपक्षसमुद्भूतैश्चामरै रुक्मभूषितैः ॥ ८ ॥
सीतादास्यस्तथा सीतां वीजयामासुरादरात् । धेनुपुच्छोद्भवैर्दिव्यैश्चामरैर्हेममंडितैः ॥ ९ ॥
ततः सीताकरं धृत्वा द्राक्षावल्या सुमण्डपम् । ययौ रामोऽङ्कणोद्भूतं तस्थौ तदध आसने ॥१०॥
ही बातें भी करते जाते थे। इस प्रकार भोजन करके रामने सीताके हाथोंको दिया हुआ दान खाया ॥ ६७-७०॥ तदनन्तर मन्त्रियों बन्धुओं तथा नित्यमित्रोंके साथ विविध प्रकारकी बातें कहते-सुनते हुए सभाभवनमें पधारे ॥ ७१ ॥ तदनन्तर सीताने भी भोजन किया कपड़े बदले और नाना प्रकारके अलंकारोंको पहनकर अपने शयनागारमें जा बैठीं। वहाँ सीताकी सखियाँ भी उन्हें चारों ओरसे घेरकर बैठ गयीं ॥ ७२ ॥ सीता वहाँ बैठी हुई सारिका (मैना) के साथ खेलतीं तथा इधर-उधरकी बातें करती हुई रामचन्द्रजीके आगमनकी प्रतीक्षा कर रही थीं। यह सब करते हुए भी सीताकी आँखें रामको देखनेके लिए द्वारपर ही लगी हुई थीं ॥ ७३ ॥ इति श्रीमत्कविराजचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये 'ज्योत्स्ना'भाषाटीकायां विकासकाण्डे पञ्चमः सर्गः ॥ ५ ॥
श्रीरामदासने कहा—सभाभवनमें कुछ देर बैठनेके अनन्तर राम अपने बन्धुओंके साथ प्रसन्नतापूर्वक शयनगारकी ओर चले। बंदीजन भगवान्की स्तुति करने लगे। निद्राशालाके पास जाकर रामने लक्ष्मण आदिको बिदा कर दिया। दासियोंके साथ वे भीतर गये और वहाँ बैठी हुई सीताको देखा ॥ १ ॥ २ ॥ सीताने भी जब देखा कि रामजी आ गये हैं, तब अपनी मैनाके साथका खेल बन्द करके धीरे-धीरे उनकी ओर बढ़ीं। उन्हें प्रणाम किया और हाथ पकड़कर पलंगपर बैठा लिया। फिर पीनेके लिए जल दिया और उत्तम ताम्बूल खिलाया ॥ ३ ॥ ४ ॥ इसके बाद रामचन्द्रजी रत्नभूषित पलंगपर सो गये और दासियाँ पंखा झलने लगीं ॥ ५ ॥ क्षण भरके बाद सीता पलंगसे नीचे उतरीं, तब रामजी भी जाग गये ॥ ६ ॥ सीताने जब देखा कि वे भी उठ हैं, तब फिर पीनेके लिए जल और खानेको पान दिया ॥ ७ ॥ रामकी दासियाँ रामको और सीताकी दासियाँ सीताको पंखा झल रही थीं। उन दासियोंके हाथमें मोरके पंखोंका बना हुआ पंखा था और उसमें सुवर्णकी मूठ लगी हुई थी ॥ ८ ॥ कुछ देर बाद रामचन्द्रजी सीताका हाथ अपने हाथमें पकड़े हुए एक अंगूरी लताओंके बने सुन्दर मण्डपमें पहुंचे और उसके आंगनमें एक आसनपर बैठे