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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात

Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)

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DevanagariHindipublished811 pages

Page 287 of 811

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Page 287

सर्गः ४] विलासकाण्डम् २७१


ततो ददृशुः शिरसि मुक्ताजालानि भूसुराः। हेमन्ततन्तुगुम्फितानि रत्नपुष्पयुतान्यपि ॥८०॥
मणिवैदूर्यकाश्मीरविद्रुमैश्चित्रितानि हि। तदूर्ध्वं पुष्पजालानि सुगन्धीनि व्यलोकयन् ॥८१॥
ततो वेण्यां भूषणानि ददृशुस्ते वराणि हि नानापक्ष्युपमान्येव माणिक्यचित्रितानि हि ॥८२॥
पल्लवान्तरवर्तीन्यतिदीप्यदुज्ज्वलानि च। हेमन्ततन्तुमान् गुच्छान् मुक्ताहारविमिश्रितान्॥८३॥
लम्बमानान् ददृशुस्ते मणिमाणिक्यसंयुतान्। वेण्यग्रेमंस्थितानरम्यन्नपुष्पापाडममन्वितान् ८४॥
एवं सीतां ददृशुस्ते श्रान्त्यस्तविभूषयाम्। सर्वांलङ्काररहितां तां द्रष्टुं कोऽपि न क्षमः। ८५॥
दिव्यालङ्काररत्नानां प्रभया हतलोचनाः। वामहस्तेन पात्रं च दर्वों दक्षिणसत्करे। ८६॥
दधानां पद्मचरणां रत्नोत्पलकरां वराम्। पद्मास्यां पद्मपत्रक्षीं पद्मगर्भस्वरूपिणीम्। ८७॥
दिव्यकर्पूरगन्धैश्च चन्दनैरपि चर्चिताम्। स्फुरन्मञ्जीरचरणां दिव्यकङ्कणमण्डिताम् ।८८॥
स्तपदालक्तवर्णेन गतिं दर्शयतीं निजाम्। रत्नांगदधरां सीतां ददृशुस्ते द्विजादयः ॥८९॥
गजेंद्रगमनां रम्यां दिव्यपुष्पैः सुशोभिताम्। दिव्यमन्दारकुसुममालाभिश्च सुशोभिताम् ॥९०॥
कस्तूरीकृततिलकां कुंकुमेन सुशोभिताम्। हरिश्रिया कज्जलाद्यैर्मण्डितां च स्मित्ताननाम् ९१॥
इति दृष्ट्वा जानकीं तेऽभूवन् चित्रोपमास्तदा। आत्मानं न विदुः सर्वे सीतासौंदर्यविस्मिताः ॥९२॥

इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये विलासकाण्डे
सीतालङ्कारवर्णनं नाम चतुर्थः सर्गः ॥४॥


इसके अनन्तर उन राजाओंने सिरपर सुशोभित मोतियोंको देखा, जो सुवर्णके तारमें गुँथे थे और उनके बीच-बीचमें रत्ननिर्मित पुष्प पड़े हुए थे, ७९॥ ८०। वे भी मणि वैदूर्य काश्मीर-विद्रुम आदिस चित्रित थे। उसके बाद उनके ऊपर लगे हुए सुगन्धित फूलोंको देखा ॥ ८१ ॥ तदनन्तर वेणीमें लगे हुए सुन्दर आभूषणोंके ऊपर लोगोंकी दृष्टि पड़ी जो विविध प्रकारके उन माणिक्य-चित्रित पक्षियों जैसे दीखते थे, जो पत्तोंके भीतर बैठे हुए अतिशय दीप्तिमान् हो रहे हों सुवर्णके तारोंसे बने गुच्छ मोतियोंके हारसे मिले तथा मणि-माणिक्यसंयुक्त थे। वे वेणीके अग्रभागमें लटक थे और उनमें नाना प्रकारके फूल गँथे हुए थे ॥ ८२ ८४ । सीताने बोझके डरसे बहुतसे आभूषणोंको निकाल दिया था। फिर भी सब प्रकारके अलङ्कारोंको धारण किये हुएके सदृश दीखनेवाली सीताको लोगोंने देखा सही, किन्तु कोई भी अच्छी तरह नहीं देख सका ॥ ८५ ॥ क्यों कि उन अलंकारोंके प्रभावके आगे लोगोंकी दृष्टि ही नहीं ठहरती थी। सीताके बाएँ हाथमें एक पात्र था और दाहिने हाथमें कलछी थी ॥ ८६ ॥ उनके चरण कमलसराखे थे। रत्नोंसे बने हुए कमलकी नाईं सीताके हाथ थे। कमलके समान मुख, पद्मपत्रके समान आँखें तथा कदलीके खम्भेके भीतरी भागके समान कोमल स्वरूप था। दिव्य कर्पूर तथा चन्दनसे उनका समस्त शरीर चर्चित था। झमझम करता हुआ मंजीर पाँवोंमें था और दिव्य कंकण सीताके पाँवोंमें पड़े थे। ८७-८८ ॥ रक्तवर्णके चरणोंसे वे अपनी मन्द गति दिखा रही थीं। रत्ननिर्मित विजायठ हाथमें पड़े थे। इस प्रकारकी सीताको लोगोंने देखा ॥ ८९ ॥ गजेन्द्रके समान उसकी मन्द गति थी। दिव्य पुष्पोंसे सुशोभित तथा दिव्य मंदार विरचित मालाओंसे अलंकृत होकर कस्तूरीका तिलक लगाये हुए थी, उनकी आँखोंमें काजल लगा था और वे मन्द-मन्द मसका रही थीं। इस प्रकारकी सीताको देखकर देखनेवाले चित्रलिखित जैसे हो गये और उनके सौन्दर्यसे विस्मित होकर वे सब अपने आपको भूल गये। ९०-९२॥ इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे 'ज्योत्स्ना'भाषाटीकासमन्विते विलासकाण्डे चतुर्थः सर्गः ॥ ४ ॥