श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात
Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)
Page 277 of 811
Read in contextसर्गः ३ ] विलासकाण्डम् २६१
तृतीयः सर्गः
(सीताकृत आध्यात्मिक प्रश्नके उत्तरमें रामका देहरामायण-वर्णन)
श्रीरामदास उवाच
अथ सा जानकी रामं विनयाल्लज्जिताऽब्रवीत् । राम राजीवपत्राक्ष किञ्चित्प्रष्टुं मम प्रभो ॥ १ ।
वांछाऽस्ति चेत्कृपोपन्नाऽज्ञां तर्हि पृच्छाम्यहं नवं । तन्माताऽचनं श्रुत्वा राघवः प्राह जानकीम् ॥ २ ।
पृच्छस्व सीते यत्तेऽस्ति प्रष्टव्यं मां सुखेन ननु । मा शङ्कां मन रम्भोरो गुह्यं चापि वदामि ते ॥ ३ ।
तद्रामवचनं श्रुत्वा नव्या न प्राह जानकी । राम राम महाबाहो किञ्चिदुपदिशस्व माम् ॥ ४ ।
येन मां नव महान् भवेदर्थश्च महोज्ज्वलम् । तन्सीतावचनं श्रुत्वा रामचन्द्रोऽब्रवीद्वचः ॥ ५ ॥
सम्यक् पृष्टं त्वया गीते शृणुष्वैकाग्रमानसा । मम ज्ञानाथ ते वच्मि परं कौतूहलं शुभम् ॥ ६ ।
श्रीरामचन्द्र उवाच
सच्चिदानन्दरूपाब्धेरात्मसागरस्य तदिच्छया । जगद्रूपस्याऽऽभांशबिंदुः शुद्धो विनिर्गतः ॥ ७ ॥
आत्मनामा मातृभूतबुद्धेर्नारायणात्परः । शुद्धसत्त्वान्तःकरणं पिता चान्यन्न इंगितः ॥ ८ ॥
तस्यात्मनश्च चत्वारो भेदास्ते प्रथयः स्मृताः । तुर्यावस्थस्तत्र वरस्तो जाग्रदवस्थकः । ९ ॥
स्वप्नावस्थस्तृतीयश्चावरः सुषुप्त्यवस्थकः । हृदयाकाशस्तस्थानं मनोवेगो बहिर्गमः ॥१०॥
मनोदुर्वृत्तिपातश्च मनोवेगस्य खंडनम् । मायायोगस्ततस्तस्य पूर्वसंस्कारनिग्रहः । ११॥
ततः कुबुद्धिहेतोर्हि भवारण्यऽटनं चिरम् । दम्भस्य निग्रहस्तत्र पंचभूतात्मिका स्थिरा ॥१२॥
आत्मनः पर्णकुटिका विश्रान्तिस्थानमीरिता । कामक्रोधलोभप्रमत्तशत्रूणाकृन्तनं स्मृतम् ॥१३॥
मोहस्य निग्रहस्तत्र शुद्धमायाश्रयन्वतः । रजोरूपा तु या माया जठराग्नी तदा स्मृता ।१४।
श्रीरामदास कहने लगे-कुछ देर बाद लज्जा और विनयसे सकुचाती हुई सीताजी रामचन्द्रसे बोलीं- हे प्रभो ! मैं आपसे कुछ पूछना चाहती हूँ ॥ १ ॥ यदि आप आज्ञा दें तो पूछूं । सीताकी वाणी सुनकर राम-चन्द्रजीने कहा-॥ २ । हे प्रिये ! जो कुछ भी तुम्हारी इच्छा हो, आनन्दपूर्वक पूछो । किसी प्रकारकी शङ्का मत करो । यदि कोई गुप्त बात होगी, वह भी मैं तुमसे बतलाऊंगा । ३ ॥ इस तरहकी बात सुनकर सीताजी कहा- हे महाबाहो राम ! मुझे आप कोई ऐसा उपदेश दें, जिससे मैं आपको अच्छी तरह समझ लूँ । इस बातको सुनकर रामने सीतासे कहा ॥ ४ । ५ ॥ हे देवि सीते ! तुमने बहुत ही अच्छी बात पूछी है मैं अपने वास्तविक तत्त्वको तुम्हें अच्छी तरह समझाता हूँ मन एकाग्र करके सुनो । आत्मज्ञान-प्राप्तिके लिए मैं तुम्हें कौतूहलजनक बात बता रहा हूँ । ६ । रामचन्द्रजी कहने लगे- सत्, चित् और आनन्दरूपी एक महान् सागर है। उसकी इच्छारूपी तरङ्गसे एक परम पवित्र आत्मारूपस्वरूप बिन्दु निकला । उसका नाम पड़ा 'आत्मा' उसकी माता हुई शुद्ध, बुद्ध और सत्त्वमय अन्तःकरण उसका पिता हुआ ॥ ७ ॥ ८ ॥ उस आत्माके चार भेद हुए वे ही आत्माके चार भाई कहलाये । उनमें सबसे श्रेष्ठ हुई तुरीयावस्था, उससे कुछ न्यून जाग्रदवस्था, फिर स्वप्नावस्था और सबसे निम्न श्रेणीकी सुषुप्ति अवस्था हुई इन सबका हृदयाकाश स्थान है और मनकीगति ये अवस्थायें कभी कभी बाहर भी हो जाती हैं ॥ ९ ॥ १० ॥ मनकी दुष्ट वृत्तियोंका खण्डन, मनके आवेगपर आघात और मायाके प्राबल्यसे पूर्वसंस्कारोंका दमन करना होता है ॥ ११ ॥ यदि बुद्धि किसी तरह दूषित हुई तो इस संसाररूपी घोर जङ्गलमें बहुत दिनों तक आत्माको भटकना पड़ता है । उस समय पञ्चभूतात्मक आत्माको स्थिर करके दम्भका निग्रह करनेकी आवश्यकता होती है । १२ ।। केवल आत्मा-रूपिणी ही एक ऐसी पर्णकुटी है जहाँ कि शान्ति मिलती है । अन्यत्र सब जगह क्लेश ही है। उस पर्णकुटीमें काम, क्रोध, लोभ माह्लादि शत्रु नहीं जाने पाते । मायाकी भी वहाँ गति नहीं है। वहाँ मोहका भी निग्रह हो जाता है वहाँ ही शुद्ध-सात्त्विकी मायाका आश्रय प्राप्त होता है उस समय जब कि रजोगुणमयी