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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात

Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)

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DevanagariHindipublished811 pages

Page 273 of 811

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Page 273

सर्गः २ ] विलासकाण्डम् ५६७


चतुष्कोणेषु सर्वेषां मंचकानां महोज्ज्वलाः । रत्नदीपाः प्रकाशंते सदैवाग्निशिखोपमाः ॥ १८॥
उशीरव्यजनादीनि चामरादीनि संति हि । यत्र ताम्बूलपात्राणि हेमरत्नोद्भवानि च ॥१९॥
तथा निष्ठीवनार्थं हि पात्राणि रजतानि च । यत्र रंभोपमा दास्यः शतशो रत्नभूषिताः ॥२०॥
चामरैर्वीजयंत्यद्य सीतारामावहर्निशम् । यत्र हेममयाश्चित्रा बद्धास्ते पंजराः शुभाः ॥२१॥
ये यागे नृपरत्नैर्भिः श्रीसीतायाः समर्पिताः । येषु वै केकिनो हंसाः सरसाः सारिकाः शुकाः ॥२२॥
लावकाः कोकिलाद्याश्च नाना येऽन्य पतत्रिणः । नाना शब्दान्प्रकुर्वन्तः शतशस्तेषु संस्थिताः ॥२३॥
तेषां शब्दस्य शिष्य त्वां कि प्राकट्यं वदाम्यहम् । ये रामस्मरणेनैव जीवन्मुक्ता न संशयः ॥२४॥

पक्षिण ऊचुः

जयतु राघवो जानकीयुतो जयत्वखिलराजराजेश्वरः ।
दशरथात्मजो लक्ष्मणायजो जयतु तापसस्ताटिकांतकः ॥२५॥
जयतु कौशिकस्याध्वरं गतो जयतु रक्षसां भग्नो महान् ।
जयतु गौतमस्याहल्या स्तुतो जयतु जानकीतातमानितः ॥२६॥
जयतु नः पतिश्चापमंडनो जनकजावरेन्मुक्तमालया
नृपमभागणे कौशिकानुगः परमशोभितश्चातिहर्षितः ।२७॥
जयतु भूमिजां प्रयोन्नदां मुदा निजकरोत्पले स्थाप्य राघवः
कमलहस्तकलशारूणां स रघुनन्दनः पातु नः सुखम् ॥२८॥
जयतु भूमिजालिंगितो महान् जनमनोहरश्चातिशोभनः
पाशुगमदं गृह्य वै धनुर्निजपितुस्तदाऽदर्शयद् बलम् ॥२९॥
जयतु सीतया भोगकृच्चिरं जयतु कैकयीप्रेरितो वनम्
जयतु पर्वते वासकृच्चिरं जयति योऽत्रिणा पूजितो वने ॥३०।


चमर रक्खे हुए हैं। कहीं सुरगायका चमर रक्खा है । कहीं तालके और कहीं खजूरके बहुतसे पंखे रक्खे हुए हैं ॥ १७ । पलंगके चारों ओर अच्छी रोशनी देनेवाले अग्निशिखा सदृश रत्नमय दीपक रक्खे हुए हैं ॥ १८ ॥ बहुतसे खस आदिके पंखे तथा चमर रक्खे हैं भगवान्के उस विलासभवनके पानदान सुवर्णके हैं उसमे जगह-जगह हीरा-पन्ना आदि रत्न जड़े हुए हैं ॥ १९ । जितने उगलदान हैं, सब चाँदीके हैं। वहाँ अनेक प्रकारके गहने पहिने रंभा जैसी सैकड़ों सुन्दरी नारियाँ राम और सीताको पंखा हाका करती हैं। उसमें सोनेके कितने ही पिंजरे बँधे हुए हैं ॥ २० ॥ उनको यज्ञमें आयी हुई रानियोंने सीताजीको उपहारमें दिये थे। जिनमें मयूर, हंस, सारस, मैना, बटेर, कोयल आदि सैकड़ों प्रकारके पक्षी कितनी ही तरहकी बोली बोलते रहे थे ॥ २१ ॥ २२ ॥ हे शिष्य ! वे पक्षी क्या बोलते थे वह मै तुम्हें स्पष्ट करके बतलाता हूँ। इसमें कोई सन्देह नहीं कि वे पक्षी बारम्बार रामका नाम लेनेसे जीवन्मुक्त ही गये थे ॥ २३ ॥ २४ ॥ पक्षी बोले - सीतापति रामचन्द्रजीकी जय हो, अखिलराजराजेश्वरकी जय हो दशरथात्मज रामचन्द्रजीकी जय हो, लक्ष्मणाग्रज रामकी जय हो। श्रीपति और ताड़काके नाशक रामचन्द्रजीकी जय हो।। २५॥ विश्वामित्रके यज्ञमे जानेवाले, राक्षसोंके विनाशकारी, गौतम-अहल्या तथा जनकजीसे सम्मानित रामचन्द्रकी जय हो ॥ २६ ॥ हमारे स्वामी, शंकरके धनुषको खण्डन करने तथा सीताजीके हाथकी जयमाला पहिननेवाले, परशुरामके दिये हुए धनुषको चढ़ाकर पिता दशरथको अपना पराक्रम दिखलानेवाले । २७-२९ ॥ सीताके साथ विलास करनेवाले, कैकेयीकी प्रेरणासे वनको जानेवाले, चिरकाल तक चित्रकूटपर निवास