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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात

Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)

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DevanagariHindipublished811 pages

Page 260 of 811

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Page 260
२७४आनन्दरामायणे[ सर्गः ९

तद्गुरोर्वचनं श्रुत्वा तथेत्युक्त्वा रघूद्वहः। आरुरोह रथं शीघ्रं सीतयार्त्विज्जनैः सह ॥४०॥
ततो नेदुर्मुन्दुभयो भेरीणां निःस्वनास्ततः। मृदंगपणवादीनां महाघोषाः समंततः ॥४१॥
वेदघोषाश्च सर्वत्र जयशब्दा द्विजेरिताः।
बभूवुर्मेघशब्दाश्च ननृतुश्चाप्सरोगणाः ॥४२॥
नानोत्सवः पूर्ववच्च कौतुकादि समन्ततः। पश्यन्ययौ रामचन्द्रः शनैरध्वरमण्डपम् ॥४३॥
अवरुह्य रथाच्छीघ्रं नीत्वारित्नि प्रक्षिप्तवान्। यत्तत्कुण्डे रामचन्द्रः सीतयार्त्विज्जनैः सह ॥४४॥
पूर्णाहुतिं ततो दत्त्वा वस्त्रैराभरणैः फलैः।
कृत्वाऽग्न पूजनं चापि यज्ञपात्राणि राघवः ॥४५॥
ततो विसर्जयामास यज्ञान्ते दक्षिणां बहु दातुं तानृत्विजः सर्वान् सौमित्रिंचोचेऽब्रवीत् ॥४६॥
कोशागारं लक्ष्मणाद्यः सर्वे मे ऋत्विजस्त्वया। नीत्वा द्वारान्निराकृत्य तूष्णीं स्थेयं ततः परम् ॥४८॥
यथेच्छयाऽमितं येन गृहीतमुत्तमं वसु।
तस्याश्रमे प्रापणीयं वाहनैश्च त्वया ॥४९।
ततो मुनिजनान् सर्वान् देयं विपुलहृष्टवतः। तद्रामवचनं श्रुत्वा लक्ष्मणोऽपि तथाऽकरोत् ॥५०॥
ततो विसर्जयामास भोजयित्वा रघूत्तमः। ऋत्विजस्तान् समुक्तानान् वाजिमेधाख्यकर्मणि ।५१॥
ततो रामोऽमरान्सर्वान् शिवादयान्त्विज्विदैर्निजैः। पूजयामास विधिवद्वस्त्राल्कारवाहनैः । ५२ ।
ददौ कोशान्यत्तुङ्गान् केषां च शिविकां ददौ।
केषां रथांश्चाजांन्केषां ददौ वस्त्रस्तथाऽपरान् ॥५३॥
एवं पृथ्वीपतींश्चापि मात्रशेषान् ससेवकान्। वस्त्रैरम्लङ्घणैर्यत्नैः पूजयामास भोजनैः ॥५४॥
ततो रामः स्वशंगारे दिव्यवस्त्राणि सन्दधौ। तदा तं पूजयामसुर्बलिभिर्विवुधा नृपाः ॥५५॥

कि अब यज्ञमण्डपको चलना चाहिये ॥४०॥ इस तरह गुरुजीके वचन सुने तो राम 'तथास्तु' कहकर शीघ्र सीता एवं ऋत्विक् लोगोंके साथ रथपर चढ़े ॥४१॥ उस समय नगाड़े बजने लगे, भेरीके शब्द होने लगे और मृदंग-पणव प्रभृति वाद्योंके घोषसे सब दिशायें व्याप्त हो गयीं ॥४२॥ ब्राह्मण वेदघोष तथा जयजय-कारके शब्द करते हुए वैदिक मन्त्रोंका उच्चारण करने लगे और अप्सरायें नाचने लगीं। ॥४३॥ पहलेकी तरह विविध उत्सवों एवं कौतुकोंको देखते हुए राम शनैः शनै यज्ञमण्डपपर गये ॥४४॥ वहाँ उन्होंने शीघ्र रथसे उतरकर साथकी अग्निको यज्ञकुण्डमें छोड़ दिया। बादमें सीता एवं ऋत्विजोंके साथ पूर्णाहूति करने लगे। उन्होंने वस्त्र-आभूषण एवं फलोंसे अग्निका पूजन करके यज्ञपात्रोंका विसर्जन कर दिया और यज्ञान्तेम ऋत्विजोंको विपुल दक्षिणा देनेकी आज्ञा देते हुए रामने लक्ष्मणसे कहा- ॥४५॥ ४६ ॥ ४७॥ हे लक्ष्मण ! इन सब ऋत्विजोंको कोषागारमें ले जाकर वहाँके पहरेदारोंको हटा दो और तुम चुपचाप अलग खड़े हो जाओ ॥४८॥ जिसको जितनी इच्छा हो, उसको बिना रोक टोक उतना द्रव्य ले लेने दो। लिया हुआ द्रव्य वाहनोंके द्वारा इनके आश्रमपर पहुँचावा दो ॥४९॥ फिर खुशहाथ मुनियोंको दान दो। इस तरहका वचन सुनकर लक्ष्मणने भी रामजीके कथनानुसार ही दान दिया ॥५०॥ तदनन्तर अश्वमेध यज्ञमें जिनका वरण हुआ था, उन ऋत्विजोंको भोजन कराके रामजीने विसर्जित किया ॥५१॥ इसी तरह समस्त देवताओंको भी विधिवत् वस्त्र-अलंकारोंसे पूजित करके विसर्जित कर दिया ॥५२॥ उनमें से किसीको रामचन्द्र-जीने खजानेके हाथ धोड़े दिये, किसीको अच्छी-अच्छी पालकी दी, किसको हाथी, किसीको घोड़े और अच्छे-अच्छे कपड़ों तथा गहनोंका उपहार देकर सम्मानित किया ॥५३॥५४॥ इसके अनन्तर रामचन्द्रजीने स्वयं कपड़े पहने। उस समय समस्त देवताओं तथा राजाओंने नाना प्रकारकी भेंट देकर रामचन्द्रजीका