श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात
Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)
Page 255 of 811
Read in contextसर्ग ८ ] बालकाण्डम् २३९
वसिष्ठेन पुरोधाभिनांनातीर्थजलैस्तदा । समाभिषेकं ते चक्रुरुद्यतं मंत्रैर्मुनीश्वराः ॥४९॥
देवदुन्दुभयो नेदुर्ननृतुश्चाप्सरोगणाः । मुमुचुः पुष्पवृष्टींश्च देवाश्चैव विमानतः ॥५०॥
संस्नुस्तत्र ततः सर्वे वर्णाश्रममुखा जनाः । मग्ना भक्तिनद्यां भक्त्वा मुक्ताः स्वपातकात् ॥५१॥
अथ रामोऽहते क्षौमे परिधाय स्वलङ्कृतः । शुशुभे नितरां दिव्यकंकणाभ्यां सुमंडितः ॥५२॥
केयूराभ्यां कुण्डलाभ्यां मुक्ताहारैश्च चारुभिः । कटिसूत्रेणहैमेन रत्नानां नूपुरादिभिः ॥५३॥
हृदि चिन्तामणियुतः कण्ठे कौस्तुभमण्डितः । दिव्यगन्धोपलिप्ताङ्गो प्रत्यक्षा दीप्तितारका ॥५४॥
कोटिसूर्यप्रतीकाशः सितच्छत्रेण धारितेन । सर्वलक्षणसंयुक्त ऋषिभिः परिवारितः ॥५५॥
अर्थार्थिभ्योऽददात्काले यथाशास्त्रं च दक्षिणाः। स्वलङ्कृतेभ्यो वप्रुत्थ्य गोधनुर्गजवाजिनः ॥५६॥
कामधेनुमलङ्कृत्य गुरवे दातु मुद्यतः । वसिष्ठस्तु चिन्तयामास वसिष्ठाङ्गश्चयेरिति ॥५७॥
अस्ति मे नन्दिनी नाम्नी कामधेनुसुता शुभा । तस्याः प्रसोतिरेवेयं मया पूर्वं समर्पिता ॥५८॥
अस्यैवास्तु कामधेनुर्गवां योग्यो रघूत्तमः । वर्जयित्वा स्वलङ्कारान्सीतां याचेऽथ भामिनीम् ॥५९॥
याचाम्यहं शुभां सीतां सालङ्कारां सुदक्षिणाम् । यं दातुं गच्छेयाद्दर्शयिष्येऽहमहं जनान् ॥६०॥
इति निश्चित्य स गुरुमृद्रा प्राह रघूत्तमम् । संप्रति किं वृथादानेन तृप्तिर्न मे भवेत् ॥६१॥
यदि दास्यसि देया मे सासाऽलङ्कारा शुभा सीता। तन्निश्चलम्मन्ये नान्यैर्गवाशतनैरपि ॥६२॥
तन्मुनेर्वचनं श्रुत्वा वसिष्ठस्य जनास्तदा । हाहाकारं महञ्चक्रुर्विषण्णा भयविह्वलाः ॥६३॥
केचिदूचुर्गमिष्ठोऽयं किं भ्रांतो जठरोऽथ किम्। केचिदूचुर्विनोदोऽयं कुतोऽस्मिन्मुनिभाषितः ॥६४॥
केचिदूचू राघवस्य धैर्यं पश्यन्त्ययं मुनिः । केचिदूचु सघोऽथ किं करिष्यति पश्यताम् ॥६५॥
एतस्मिन्नन्तरे रामः श्रुत्वा तत्त्वं गुरोर्वचः । सत्यं संजया सीतामाहूय गुरूसन्निधौ ॥६६॥
साथ श्रीरामको आचमन कराकर स्नान कराया ॥४८॥ तदनन्तर मार्गमें पहले अवधूतके लाये हुए विचित्र तीर्थोंके जलसे उन्हें स्नान कराया ॥४९॥ उस समय मधुरोक नगाड़ाहरू राग-साथ देवताओंके नगाड़े भी बजने लगे और देवता ऋषि, पितर मेघतुल्य पुष्प बरसाने लगे ॥५०॥ तथा वर्णाश्रमी लोग रामतार्थमें स्नान करने लगे। समस्त वर्णों भी वहाँ स्नान करके अपने पातकोंसे छूट गये ॥५१॥ इसके बाद राम नवीन रेशमी वस्त्र पहिन तथा हाथोंमें सुन्दर कंकण बाँधकर अत्यन्त सुशोभित होने लगे ॥५२॥ दोनों बाजुओंम केयूर, कानोंमें कुण्डल, गलेमें मुक्ताहार तथा कमरमें करधनी और पैरोंमें रत्नजड़ित नूपुरोंको पहनते हुए सीताजी भी अत्यन्त सुशोभित हो रही थीं ॥५३॥ भगवान् राम हृदयपर चिन्तामणि और कण्ठमें कौस्तुभ मणि दक्षिण हुए थे । इस विलासपूर्ण सौंदर्यकी कान्ति चमत्कृत हुए कोटि सूर्योंकी कान्तिके समान तेजस्वी श्रीरामचन्द्र ऋषियोंगणोंसे परिवेष्टित होकर श्वेतच्छत्र लगाये हुए श्रेष्ठ आसनपर सीताके साथ बैठ गये ॥५४॥ ५५॥ तदनन्तर अर्थियोंकी याचनाके अनुसार और ब्राह्मणोंको अलंकृत करके व शास्त्रानुसार गो, भूमि, घोड़े एवं हाथी दान देने लगे ॥५६॥ जब वे कामधेनुको भी अलंकृत करके गुरु वसिष्ठको देनेके लिए उद्यत हुए, तब वसिष्ठ विचार करने लगे- ॥५७॥ मेरे पास इनकी कन्या नन्दिनी है ही, तब इससे मेरा क्या अर्थ सिद्ध होगा। मुझे इसका कोई प्रयोजन नहीं है। यह कामधेनु राम ही के पास रहे तो अच्छा हो। क्योंकि इसके योग्य राम ही हैं। इसको छोड़कर मैं सुवर्ण आदि अलङ्कारोंसहित सालंकृता एवं सुरूपा सीताको मांगता हूँ। ऐसा करके मैं आज रघुकुलमें अपनी शक्ति को प्रदर्शित करूँगा ॥५८-६०॥ ऐसा निश्चय करके वसिष्ठजी बोले -क्या आप कामधेनु दान करेंगे? इससे मेरी तृप्ति नहीं होगी ॥६१॥ यदि देना ही हो तो अलङ्कारोंसे सुशोभित सीताको दीजिये, उसके देनेसे मुझे तृप्ति होगी। अन्य सैकड़ों स्त्रियोंसे भी मेरी तृप्ति न होगी ॥६२॥ इस प्रकार ऋषि वसिष्ठके वचन सुनकर विषण्ण एवं भयविह्वल जनता महान् हाहाकार करने लगी ॥६३॥ जनता कहने लगी-"मालूम पड़ता है कि बूढ़ा बोमट पागल हो गया है" "नहीं भाई' किसीने कहा "ऋषिने रामसे मजाक किया है" ॥६४॥ कोई कहने लगा-'ऋषि रामजीके धैर्यको आजमा रहे हैं"। कोई कहन