श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात
Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)
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Read in context२२८ आनन्दरामायणे [ सर्गः ६
कीर्त्तितं पठितं चित्ते धृतं संस्मारितं मुदा । अन्यतः शृण्वदन्मर्त्यैः सोऽपि मुच्येत पातकात् ॥ ४८ ॥
ब्रह्महत्यादिपापानां निष्कृतिं यदि वाञ्छति । रामस्तोत्रं मासमेकं पठित्वा मुच्यते नरः ॥ ४९ ॥
दुष्प्रतिग्रहदुर्भोक्तृदुरालापादिजम्भवम् । पापं सकृत्कीर्तनेन रामस्तोत्रं विनाशयेत् ॥ ५० ॥
श्रुतिस्मृतिपुराणेतिहासोपामशतानि च । अर्हन्ति नाल्पां श्रीरामनामकीर्तिकलामपि ॥ ५१ ॥
अष्टोत्तरशतं नाम्नां सीतारामस्य पावनम् । अस्य संकीर्तनादेव सर्वान् कामाँल्लभेनरः ॥ ५२ ॥
पुत्रार्थी लभते पुत्रान् धनार्थी धनमाप्नुयात् । स्त्रियं प्राप्नोति पत्न्यर्थी स्तोत्रपाठश्रवादिनः ॥ ५३ ॥
कुम्भोदरेण मुनिना येन स्तोत्रेण राघवः । स्तुतः पूर्वं यज्ञवाटे तदेतत्ते मयोदितम् ॥ ५४ ॥
इति श्रीमत्कोटिरमचचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये यागकाण्डे श्रीरामनामाष्टोत्तरशतनामस्तोत्रं नाम पञ्चमः सर्गः ॥ ५ ॥
षष्ठः सर्गः
( रामकी दिनचर्या )
श्रीरामदास उवाच
अथ कुम्भोदरे दिव्ये चासनोपरि संस्थिते । यज्ञस्तम्भे श्यामकर्णं बबन्धुस्ते हि ऋत्विजः ॥ १ ॥
तस्याङ्गानि समस्तानि पृथङ् मन्त्रैर्यथाविधि । मन्त्रयित्वापि शमित्रा तं निजघ्नुर्द्विजपुङ्गवाः ॥ २ ॥
तन्मांसखण्डैराज्याक्तैर्होमं चक्रुः सविस्तरम् । तथा नानाविधैर्द्रव्यैः सक्तुपायसगोधूमैः ॥ ३ ॥
मध्वाक्ततिलदूर्वाद्यैः समिधाभिश्च सादरम् । गोघृतेन वसोर्धारां वह्नौ स्थूलामखण्डिताम् ॥ ४ ॥
गोशृङ्गेनोर्ध्वबद्धेन ददुर्मन्त्रैः सविस्तरम् । चिरकालं होमकुण्डे यावद्यज्ञसमापनम् ॥ ५ ॥
तदा धूमचयैर्व्याप्तमाकाशं च समन्ततः । नाद्यापि दृश्यते शुभ्रं नीलाभं प्रहृश्यते ॥ ६ ॥
चैत्रमासे महापुण्ये वसन्ततौ सुखावहे । एवं प्रवर्त्तयामासुर्वाजिमेधं मुनीश्वराः ॥ ७ ॥
दुर्बोध रहता है, जबतक इस उत्तम स्तोत्रमें निष्ठा नहीं होती ॥ ४७ ॥ जो इसको पढ़ता और कीर्तन करता है, जो डम चित्तमें धारण करता है, प्रेमसे स्मरण करता है और औरोंसे सुनता है, वह भी पातकोंसे छूट जाता है ॥ ४८ ॥ जो ब्रह्महत्यादि पापोंकी निष्कृति चाहता हो, वह पुरुष एक महीने इसका पाठ करे ॥ ४९ ॥ इसके एक बार कीर्तन करनेसे मनुष्य दुष्प्रतिग्रह, दुर्भोज्य तथा दुरालापादिजन्य पापोंसे छूट जाता है ॥ ५० ॥ श्रुति-स्मृति-पुराण-इतिहास-आगम (वेद) और स्मृति इसकी सोलहवीं कलाको भी नहीं पहुंचते ॥ ५१ ॥ श्रीसीतारामके इस पावन अष्टोत्तरशतनामका जो मनुष्य पाठ करता है, वह सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। इसका पाठ एवं श्रवण करनेसे पुत्रार्थीको पुत्र, धनार्थीको धन और स्त्री चाहनेवालेको स्त्री मिलती है ॥ ५२ ॥ ५३ ॥ बागस्त्य मुनिने जिस स्तोत्रके द्वारा अश्वमेध यज्ञमें रामचन्द्रकी स्तुति की थी, वही स्तोत्र मैंने तुमसे कहा है ॥ ५४ ॥
इति श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये यागकाण्डे श्रीरामनामाष्टोत्तरशतनामस्तोत्रं नाम पञ्चमः सर्गः ॥ ५ ॥
श्रीरामदास बोले—इसके अनन्तर कुम्भोदर मुनि दिव्य आसनपर बैठ गये । उधर ऋत्विक् लोगोंने यज्ञस्तम्भमें श्यामकर्ण अश्वको बांध दिया ॥ १ ॥ हे द्विजश्रेष्ठ ! उसके अंगोंको शास्त्रानुसार मन्त्रोंसे अभिमन्त्रित करके ब्राह्मणोंने उसका वध किया ॥ २ ॥ तब घृतमें सने हुए घोड़ेके मांसखण्डों एवं सक्तु पायस गोधूम आदि नाना द्रव्योंसे ऋत्विक् लोग हवन करने लगे ॥ ३ ॥ हे हूं! मधुमें सने हुए तिल, दूर्वा, समिधा तथा गोघृतकी अखंड एवं स्थूल वसोर्धाराको अग्निमे छोड़ने लगे ॥ ४ ॥ चिरकाल पर्यन्त जब तक यज्ञ समाप्त नहीं हुआ, तबतक वे ऊपर बँधे हुए गोशृङ्गके द्वारा होमकुण्डमें समन्त्र आहुति देने रहे ॥ ५ ॥ इसके सम्पूर्ण आकाश-मंडल धूमसमूहसे व्याप्त हो गया । उसीके कारण आज भी आकाश श्वेत नहीं, नीला ही दीखता है । सुखावह वसन्त ऋतु एवं पुनीत चैत्रमासमें इस तरह वे मुनीश्वर लोग वह अश्वमेध यज्ञ कर रहे थे ॥ ६ ॥ ७ ॥