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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात

Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)

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DevanagariHindipublished811 pages

Page 223 of 811

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Page 223

सर्गः ९ ] यात्राकाण्डम् २०७


अचाण्डालांस्तर्पयित्वा स्वयं कृत्वाऽशनं तदा ।
निद्रार्थं नृपतीन् याने स्थलमाज्ञापयत्तदा ॥ ५० ॥

पञ्चरात्रं नृपान् प्रीत्या स्थापयित्वा स्ववेश्मनि ।
वस्त्रालङ्कारतुष्टैस्तोष्ययित्वा भटैस्ततम् ॥ ५१ ॥

तान् प्रोवाच रमानाथः प्रवृद्धकलशपुरान् ।
मम यज्ञानुगं दृष्ट्वा सन्तृप्तैर्गोः पुनः ॥ ५२ ॥

आगन्तव्यं जनपदैः स्वसैन्यैर्नागरैः सह ।
इत्यज्ञां नृपतीगम्य संगीकृत्य नृपोत्तमाः ॥

ययुः स्वं स्वं पुरं देशं स्वबलैः परिवेष्टिताः ॥ ५३ ॥

सुग्रीवाद्यान्वानरांश्च परिवारसमन्वितान्
आज्ञापयित्वा नद्यानि स्थापयामास स्वानिके ॥ ५४ ॥

राजिमेधानन्तरं हि प्रेषयिष्याम्ब्यहं त्विति ।
अतो दुन्दुभिनिर्घोषं स्वपुर्यां घोषयत्तदा ॥ ५५ ॥

मन्नारम्य जनैः सर्वैरयोग्यमानगर्गस्खिनैः ।
यैः कैश्चिदत्र पथिकैर्भिक्षापार्कर्न युज्यताम् ॥ ५६ ॥

यावत्कण्डम्यहं भूम्यां राज्यं सीतासमन्वितः ।
निजगार्हस्थ्यमालम्ब्य ये वर्तन्ते नरोत्तमाः ॥ ५७ ॥

ते कुर्वन्तु सुखं पार्क स्वस्वगेहेषु भक्तितः
निबंधो मम न ह्येयो वर्तितव्य यथासुखम् ॥ ५८ ॥

इत्याज्ञाप्य जनान् रामः सुखं तस्थौ त सीतया ।
अयोध्यायां तु सर्वत्र वेदघोषो गृहे गृहे ॥ ५९ ॥

मङ्गलानि समुत्साहा नर्तनं वारयोषिताम् ।
बभूवुश्च पुराणानि कीर्तनानि हरेः कथाः ॥ ६० ॥

एवमासीत्सुसंतुष्टा साकेतनगरी शुभा ।
एवं प्रोक्तं मया शिष्य यत्राकाण्डमनुत्तमम् ॥ ६१ ॥

ये शृण्वंति नरा भक्त्या तेषां यात्राफलं भवेत् ।
यात्रार्थनार्थनोयोगे यात्राकाण्डमिदं वरम् ॥ ६२ ॥

पठित्वा ये तु गच्छंति सुखनायांति ते गृहम् ।
ब्रह्महत्यादिपापानि कृतानि भनवैः सकृद् ॥ ६३ ॥

यात्राकाडमिदं जप्त्वा शुद्धिस्तेभ्यो भविष्यति ।
सर्वतीर्थावगाहेन यत्फलं परिकीर्तितम् ॥ ६४ ॥

यात्राकाण्डमिदं श्रुत्वा तत्फलं प्रतिपद्यते ।
धनार्थी धनमाप्नोति कामी कामानवाप्नुयात् ॥ ६५ ॥


ब्राह्मणोंसे लेकर चाण्डाल तकको यथोचित भोजन कराके तृप्त किया । बादम राजाओक हाथ स्वयं भोजन करके राजाओको अपनेपने विश्रामके तथा अन्यान्य महलोंमे जानेकी आज्ञा दी ॥ ५० ॥ इस प्रकार पाँच दिन तक उन लोगोंको बड़े ही प्रेम तथा सत्कारसे रामने अपने भवनमें रक्खा । बादम वस्त्र, अलंकार तथा अश्व आदि दे और उन्हें भलीभाँति प्रसन्न करके अपने-अपने स्थानको आनकी आज्ञा दी । जब वे हाथ जोड़कर जानेके लिए सम्मुख खड़े हुए, तब रमानाथ रामने फिरसे उन यज्ञके मुख्यमुख्यगणपर मस्तक संभूत अश्वके पीछे-पीछे चलनेके लिए ससैन्य और प्रजा सहित आनिक लिये कहा । वे उन इस आज्ञाक स्वीकार करक अपनी-अपनी सेन के साथ अपने-अपन देश तथा नगरकी ओर चल दिये । परिवार सहित सुग्रीव आदि वानरोको रहनेके वास्ते बहुतसे भवन देकर अरने यहाँ रक्खा और कहा कि अश्वमेध यज्ञके पश्चात् तुम लोगोंको विदा करेंगे। बादमें श्रीरामने अपने नगरमें डिंडोरा पिटवाकर कहला दिया कि आजसे लेकर मेरे नगरवासियों तथा अन्य यान्नी लोगोको अल्य भोजन बनाकर नहीं खाना चाहिये। सब लोग तबतक हमारे भोजनालयम भोजन करें, जब तक कि मै भूमिपर राज्य करूँ । हाँ, जो गृहस्थाश्रमी हों, वे भले ही अपने-अपने घरोंमें भक्तिपूर्वक सुखसे भोजन बनाएँ । उनके लिय मेरा आग्रह नहीं है। ५१-५८ ॥ यह आज्ञा देकर राम सीताके साथ सुख-पूर्वक रहने लगे । तबसे अयोध्या नगरीमे घर-घर वेदध्वनि होने लगी । ५९॥ मङ्गलगान होने लगे, सोत्साह वारंगनाओंका नृत्य होने लगा तथा पुराणपाठ और हरिकथाएं होने लगीं ॥ ६० ॥ इस प्रकार वह समस्त पुरी आनन्दित हो उठी । हे शिष्य मैंने तुमको भली भाँति उत्तम यात्राकांड सुनाया ॥ ६१ ॥ जो मनुष्य इस यात्रा-काण्डको भक्तिपूर्वक श्रवण करेगा, उसे समस्त यात्रायें करनेका फल प्राप्त होगा। यदि मनुष्य यात्रामे जानेके समय अथवा धन कमानेके लिये जाते समय इसको सुनकर जाय तो वह सुखपूर्वक और कृतार्थ होकर लौटेगा। यदि मनुष्यने ब्रह्महत्यादि जैसे घोर पाप किये हों तो वे भी इसकी मुजन्स दूर हो जाते हैं और प्राणी शुद्ध हो जाता है। सब तीर्थोंकी यात्रा करनेसे जो फल होता है, वह इस यात्राकाण्डको पढ़ने तथा सुननेसे प्राप्त हो जाता है । धनकी इच्छावालेको धन और कामकी इच्छावालेको काम मिलता है ॥ ६२-६५ ॥ इस