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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात

Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)

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DevanagariHindipublished811 pages

Page 22 of 811

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Page 22

६ आनन्दरामायणे [ सर्गः २

एतस्मिन्नन्तरे तत्र संग्रामेऽतिभयानहे। भिन्नाक्षं स्वरथं राजा नाविदाद्दैष्टसंभ्रमात् ॥७८॥
गङ्गाऽन्तिके स्थितागुप्तं कैकेयी रणकौतुकम् । पश्यन्ती स्वरथं भिन्नं ददर्श समरांगणे ।७९॥
अक्षत्वन्मा निजं हस्तं चकार जयहेतवे । तया तु पूर्वं बाल्यन्त्वाम्यस्यास्यं कस्याचेन्मुनेः ॥८०॥
कृष्णवर्णं कृतं तेन शप्ता नेऽप्यपवादतः। मुखमग्रे निर्गमिष्यन्ति नैव लोकाः कदाचन ॥८१॥
ततस्तं गन्तुमुद्युक्तं कैकेयी शुभहस्ततः। दंडादिकं ददौ तस्य मुनेर्हस्तोऽतिमक्तिकः ॥८२॥
तस्मै ददौ वरं विप्रस्तव वामकरा वरात्। भविता वज्रकठिन शस्त्रापि नाश न नैष्यति ॥८३॥
कैकेयी तं वरं स्मृत्वा स्वं चक्रागह्वरःकरम् । अथ जित्वा रणे दैत्यान् दृष्ट्वा तत्कर्म पार्थिवः ८४॥
ददौ वरो द्वौ तस्यै स न्यासरूपौ कृतो तया । यदाऽहं प्रार्थयिष्यामि तदा त्वं देहि तौ मम ॥८५॥
तथेत्युक्त्वा नृपः पत्नीं ययौ स्वनगरीं प्रति । एकदा स निशायां तु मृगयायां महावने ।८६।
चकार वाणिवृधं चावधीद्वनचरान बहून् । एतस्मिन्नन्तरं तत्र वने वाणसमीपतः ॥८७॥
कांडरूढौ स्वपितरौ स्वस्कंधे श्रवणो वहन् । काशीं नेतुं ययौ वैश्यो धर्मबाधामपाम्निति ॥८८॥
नीरं पातु शिद्यो देहि चावयोश्चेति य थितः । तय्यो कांडेके न्यस्य तटाके जनसंनिधौ ॥८९॥
गत्वा जले स्वघ कुम्भं न्युन्जंतम्थी जले क्षणम् । कुम्भस्य न्युन्जतः शब्दो बमूत् करिणो यथा । ९०।।
वनद्विपो न हंतव्यश्चेति जानन्नपि नृपः । वैश्यं राजा द्विपं मन्वा विव्याध म पत्रत्रिणा । ९१॥
पपात श्रवणस्तोये हा केन हं प्रनाडितः । मुवनश्चेति तद्वाक्यं श्रुत्वाऽभूद्विह्वलो नृपः । ९२।
पन्वा जलाद्वहर्वगात्रं कृन्वाऽऽक्रूष्णं तांदृश । मयं दूतं विशुन्यं तं चकार भयविह्वलः । ९३॥

राजा दशरथ युद्धम संम्मानित उनका स द र प्रार्थना का । तदनुसार राजा दशरथ वहाँ जाकर दानवेश घोर युद्ध करम ०।। ७६ ।। ७७ ।। उस भयानक संगामम समय राजक रथका धूरा टूट गया, किन्तु दैववश राजाका पता नही लगा । उसार लाफ पास चम्न मुन्तर भी चत्रा गनी कैकयी संग्रामका कौतुक दख रही थी। उसने सहसा रणम अपन रथका धुरा टूटत दख लिया ॥ ७९ ।। त काल उसने विजयलाभक लिए अपने बायें हाथका धुरकी जगह लगा दिया बचपनम कैकेयीन किसी सोने हुए मुनिका मुँह स्याहीस काला कर दिया था। तब मुनिन उसे शाप द दिया कि जा, तम्र मुँह भा अपयशाके कारण ऐसा काला होगा कि कोई देखना नही चाहेगा, ८० ।। ८१ ।। जब मुनि वहाँम चश्न लगे, तब कंकेय न भक्तिपूर्वक दाय हाथसे उनका दण्ड कमण्डल उन्ह दे दिया ८२ । इस सेवाम प्रगन्न होकर मुनिने उसे वरदान दिया कि जा तेरा बायाँ हाथ समय पडनपर वज्र जैसा कठोर हो जायगा और किसी तरह घायलन होगा। ८३॥ कंकेयीने उस वरका स्मरण करक ही अपने हाथको धुरक सदृश बनाबर रथमे लगा दिया था। रणम दैत्याको जीतनेके बाद राजा दशरथन कैकेयीक इस साहस भरे कार्यको देखकर प्रसन्नतापूर्वक उससे दा वर मांगनेके लिए कहा। उसने भी उन दोनो वरोको राजाके पास ही धरोहररूपमे रख दिया और कहा कि जब मै मांगू तब आप ये दो वर मुझे दे दीजियेगा । ८४ ।। ८५ ।। 'इव अच्छा कहकर राजा अपनी स्त्रीक साथ अयोध्या लोट आये। एक दिन रात्रिक समय राजा दशरथ शिकार बग्नके लिये सरयूके किनारे गहन वनम जा पहुंचे। वहाँ उन्होने बाणोंकी वर्षा करके नदीका जलप्रवाह गक दिया और बहुतसे वनपशुओको मारा। उसी समय श्रवण अपने वृद्ध नया अन्ध माता पिताका कविरम बिठाकर कांधपर उठाये हुए उस वन्य भागसे काशी ले जा रहा था । तभी गर्मासे पीडित होकर वृद्ध माता पिताने अपने पुत्रसे जल पिलानेको कहा। उनकी आज्ञा पते ही श्रवण काँवरको जलके किनारे रख तथा घडेको टेढ़ा करके जल भरने लगा तो उस घड़से हाथीके शब्द जैसा शब्द निकला ॥ ८६-६० । बनके हाथीको नहीं मारना चाहिये' इस बातको जानते हुए भी राजा दशरथने उस वैश्य श्रवणको हाथीके भ्रमसे शब्दवेधी बाण मारकर बींध दिया ।। ९१ ।। 'हाय मुझ निरपराधको किसने मारा' ऐसा चिल्लाकर श्रवण इकामसे बालूमें गिर पड़ा । मनुष्यकी बोली सुनकर राजा दशरथ घबड़ा उठे और दौड़कर वहाँ गये। उसको बा-