श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात
Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)
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Read in context| १६८ | आनन्दरामायणे | [सर्गः २ |
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श्रीशिव उवाच
सम्यक् पृष्टं त्वया देवि सावधानमनाः शृणु । नारदोक्तांश्चतुःश्लोकांस्तवाग्रे प्रवदाम्यहम् ॥५६।
शारदायापि कथिता विधिना ये पुरा शुभाः । ब्रह्मणे विष्णुना पूर्वं श्रीरामचरिते यदा ॥५७।
विभक्तं हि तदा दत्तः शेषभूतः सुपुण्यदः । तान् शृणुष्व चतुःश्लोकान् विष्णूक्तान्स्वयंभुवे ॥
श्रीभगवानुवाच
अहमेवासमेवाग्रे नान्यद्यत्सदसत्परम् । पश्चादहं यदेतच्च योऽवशिष्येत सोऽस्म्यहम् ॥५९॥
ऋतेऽर्थं यत्प्रतीयेत न प्रतीयेत चात्मनि । तद्विद्यादात्मनो मायां यथाऽऽभासो यथा तमः ॥ ६० ।
यथा महान्ति भूतानि भूतेषूच्चावचेष्वनु । प्रविष्टान्यप्रविष्टानि तथा तेषु न तेष्वहम् ॥६१।
एतावदेव जिज्ञास्यं तत्त्वजिज्ञासुनाऽऽत्मनः । अन्वयव्यतिरेकाभ्यां यत्स्यात्सर्वत्र सर्वदा ॥ ६२ ।
श्रीशिव उवाच
एवं श्लोका भगवता चत्वारश्च प्रकीर्तिताः । वेधसे ये नराये ने कीर्तिता देवि ते मया । ६३॥
एते पवित्राः पापघ्ना मर्त्यानां ज्ञानदायकाः । अज्ञाननाशकाः सद्यः कीर्तनीया नगेन्द्रजेः ॥६४॥
एवं देवि त्वया पृष्टं यथा तप्ते निवेदितम् । कथामारंभिता पूर्वमाशुना शृणु वच्म्यहम् ॥६५।
ततो रामायणं व्यासो विक्षिप्तं मुनिभिः पुनः । कुर्वकत्र शेषभूतं सप्तकाण्डैर्नतं शुभम् ॥६६।
चतुर्विंशति माहस्रं ग्रथिष्यति मुनिस्तदा । अद्याऽन्ते तत्प्रदस्य श्लोकाम्प्रचक्षिपन्ति हि । ६७।
चतुर्विंशतिसाहस्रं व्यासस्य ग्रथिता अपि । भविष्यन्ति गिरिजेंद्रे मंगलाचरणादिषु ॥६८।
...आप अवश्य मुझमे कहे ॥ ५५ ॥ शिवजीने कहा- हे देवि ! तुमने बहुत अच्छा प्रश्न किया है। अब उन इन बातोंको सावधान होकर सुनो। मैं उन नारदने कहे श्लोकोंको सुनाता हूँ ॥ ५६ ॥ उनसे भी पहिले नारद-के समक्ष श्रीरामके चरित्रस्वरूप वे ही चार श्लोक विष्णुने ब्रह्मासे कहे थे ॥ ५७ ॥ ... हे विष्णुने ब्रह्मामे उस समय कहा था, जब कि उन्होंने रामायणका विभाजन किया था । उन बचे हुए पुण्यप्रद तथा विष्णुके द्वारा कहेहुए फिर हुए चार श्लोकोंको मन लगाकर श्रवण करो ॥ ५८ ॥ श्रीभगवान्ने कहा था इस चराचर प्रपंचात्मक तथा पाञ्चभौतिक संसारके उत्पन्न होनेके पूर्व न कोई सद्वस्तु थी और न असद्वस्तु केवल सबका कारण तथा सृष्टिका बीजरूप मैं ही था। उसी प्रकार प्रलयके पश्चात् भी जो कुछ कार्यसमूहका अधिष्ठान-स्वरूप अवशिष्ट रहता है, वह भी एकमात्र मैं ही हूँ ॥ ५९ ॥ जो वास्तविक वस्तु न होनेपर भी सद्विचारके अभाववश वास्तविकरूपसे जान पड़ता है, परन्तु जब आत्म-अनात्मविषयक तत्त्वविचार किया जाता है, तब आत्माके अतिरिक्त जिसकी कोई सत्ता नहीं जान पड़ती, जड स्वभावकार्य, आस्तित्ववान् आत्माको आच्छादित करनेवाली, आत्मसम्बन्धिनी मायाको मृगमरीचिकाके आभासकी तरह तथा आकाशकी नीलिमाकी तरह मिथ्या जानना चाहिए ॥ ६० । जिस तरह पृथ्वा आदि पञ्चमहाभूत अन्यान्य भौतिक वस्तुसमूहमें अनुस्यूत होनेपर भी उनसे अलग दिखाई देते हैं। उसी तरह ये पञ्चमहाभूतोंमें व्याप्त होनेपर भी उनसे अर्थात् समस्त भौतिक संसारसे अलिप्त रहता हूँ ॥ ६१ ॥ बस, आत्मतत्त्वके जिज्ञासुओंको सदा और सब जगह अन्वय-व्यतिरेक उपयुक्त बातोंका निश्चय करके आत्मतत्त्व तथा मायाका पृथक् पृथक विरुद्ध-धर्मवाली जान लेना चाहिए। यही व्यापक नियम है ॥ ६२ ॥ शिवजी बोले-हे देवि ! भगवान् नारायणने जो चार श्लोक ब्रह्मासे कहे थे, वे मैंने तुम्हें कह सुनाये ॥ ६३ ॥ ये श्लोक पवित्र, पापनाशक, मृत्युलोकके प्राणियोंको उत्तम ज्ञान देनेवाले तथा शीघ्र अज्ञानरूपी अन्धकारको दूर करनेवाले हैं। अत समझदार मनुष्योंको निरन्तर इनका श्रवण, मनन और कीर्तन करते रहना चाहिए । ६४ ॥ हे देवि ! जो तुमने पूर्वमें प्रारम्भिक कथा पूछी, सो मैंने तुमसे कही। आगे जो कहना हूँ, वह का सुनो ॥ ६५ ॥ बादमें मुनियोंके द्वारा इधर उधर बिखरे हुए रामायणको व्यासमूनि फिरसे एकत्र करके सुन्दर सात काण्डमें चौबीस हजार श्लोकयुक्त बनाकर उसकी रक्षा करेंगे । इसी कारण चौबीस हजार श्लोकोवाली इस रामायणके बादि तथा अन्तमें मंगलाचरण आदिके प्रकरणमें व्यासरचित ओर ओर भी कुछ श्लोक दृष्टिगोचर होगे ॥ ६६-६८ ॥ हे देवि !