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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात

Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)

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DevanagariHindipublished811 pages

Page 180 of 811

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Page 180
१६४आनन्दरामायणे[ सर्गः २

तावदूर्ध्वमधश्च त्वं मन्लोकेषु निवत्स्यसि । इत्युक्त्वा भगवान् ब्रह्मा स्वयं रामस्य धीमतः । ३९॥
चरित्रं श्रावयामास वेदवाक्यैः सुपुण्यदैः । ततः संपूजितो ब्रह्मा तत्रैवान्तरधीयत ॥४०॥
ततः सशिष्यो भगवान् मुनिर्विस्मयमाययौ । तस्य शिष्यास्ततः सर्वे जगुः श्लोकमिमं पुनः ॥४१॥
मुहुर्मुहुः प्रीयमाणाः प्राहुश्च भृशविस्मिताः । समाक्षरैश्चतुर्भिर्यः पादैर्गीतो महर्षिणा ।
शोचन्नुव्याहृतोऽभूद्यः शोकः श्लोकत्वमागतः । ४२॥
तस्य बुद्धिरियं जाता महर्षेर्भावितात्मनः । कृत्स्नं रामायणं काव्यमीदृशैः करवाण्यहम् ॥४३॥
उदारवृत्तार्थपदैर्मनोगर्भैस्सदाऽस्य रामस्य चकार कीर्तिमान् ।
समाक्षरैः श्लोकवरैर्यशस्विनो मुनिः स काव्यं शतकोटिमितम् ४४॥

इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गत श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये यात्राकाण्डे
श्लोकोत्पत्तिरामायणकथनं नाम प्रथमः सर्गः ॥ १ ॥


द्वितीयः सर्गः

श्रीशिव उवाच

वाल्मीकिना कृतं देवि शतकोटिप्रविस्तरम् । रामायणं महाकाव्य जगृहुर्मुनयश्च ते ॥ १ ॥
आश्रमे तत्पठंति स्म कथयंति स्म ते मुदा । तच्छ्रोतुममराः सर्वे विमानैश्च दिवि स्थिताः २ ॥
श्रुत्वा सर्वं सविस्तारं वाल्मीकिं पुष्पवृष्टिभिः । ववृषुर्जगदुश्चंदस्ते प्रशशंसुर्मुनीश्वरम् ॥ ३ ॥
ततो देवाः सगंधर्वा यक्षा नागाः सकिन्नरा । मुनीश्वरा गुह्यकाश्च पार्थिवाः पद्मभूस्त्वहम् । ४ ॥
परस्परं ते कलहं चक्रुः कार्यार्थमादरात् ब्रह्माद्या निर्जराः सर्वे पन्नगान्दितिजान्नरान् ॥ ५ ॥
वय काव्यं विनेष्यामो दिव वाल्मीकिना कृतम् । दितिजाः पन्नगाः प्रोचुर्विनेष्यामो रसातले ॥ ६ ॥


सुखसे रहोगे। इतना कहकर स्वयं भगवान् ब्रह्माने पुण्यप्रद वेदवाक्यों द्वारा बुद्धिमान् रामका चरित्र उन्हें कह सुनाया। पश्चात् मुनिसे पूजित होकर ब्रह्मा वहींपर अन्तर्धान हो गये ॥३९-४०॥ तब शिष्यों सहित भगवान् वाल्मीकि मुनिको बड़ा भारी विस्मय हुआ और उनके शिष्य उस श्लोकका बारम्बार आनन्दसे गान लगे ॥ ४१ ॥ महर्षिने समान अक्षरोंवाला तथा चार चरणों युक्त जिस श्लोकको गाया था, उसको वे शिष्य भी प्रसन्न होकर आश्चर्यसे परस्पर कहने-सुनने लगे ॥ ४२ ॥ उस श्लोकका मुनि शोकरूप बार-बार कहते थे। अन्तमें अहो शोक श्लोक (पद्य) रूपमें परिणत हो गया, पश्चात् उन शुद्धात्मा महर्षिकी यह इच्छा हुई कि मैं इसी प्रकारके श्लोकोंमें समस्त रामायणका निर्माण करूँ ॥ ४३॥ अन्तमें उन कीर्तिमान् मुनिने मनको आनन्द देनेवाला तथा जिससे उदार चरित्र भरे अर्थोंका ज्ञान प्राप्त हो, ऐसे पद और समान अक्षरोंवाले सौ करोड़ श्लोकोंवाला यशस्वी रामका काव्य (रामायण) रचा ॥ ४४॥ इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये यात्राकाण्डे भाषाटीकायां श्लोकोत्पत्तिरामायणकथनं नाम प्रथमः सर्गः ॥ १ ॥

श्रीशिवजी बोले-हे देवि ! वाल्मीकि मुनिका बनाया हुआ सौ करोड़ श्लोकात्मक उस महाकाव्य रामायणको सब मुनियोंने अपनाया और वे हर्षपूर्वक उसे अपने आश्रमोंमें पढ़ने तथा सुनने लगे । उसको सुननेके लिए सब देवता विमानोंमें बैठकर आकाशमें छा गये ॥ १ ॥ २ ॥ उन लोगोंने विस्तारपूर्वक सम्पूर्ण रामायण सुना और मुनीश्वर वाल्मीकिजीकी स्तुति करके जयजयकार करते हुए उनपर पुष्पवृष्टि की ॥ ३ ॥ बादमें देवता, गंधर्व यक्ष, नाग, किन्नर, मुनिगण, गुह्यक, राजे-महाराजे, ब्रह्मा तथा मैं सब एक साथ उस रामायण महाकाव्यकी प्राप्तिके लिए परस्पर आदरपूर्वक झगड़ने लगे। ब्रह्मादि देवता पन्नगों, दैत्यों तथा मनुष्योंसे कहने लगे कि इस वाल्मीकीय काव्यको हमलोग स्वर्गमें ले जायँगे दैत्य तथा पन्नग कहने लगे कि हम