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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात

Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)

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DevanagariHindipublished811 pages

Page 164 of 811

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Page 164
१६८आनन्दरामायणे[ सर्गः १३

शिरः संयोज्य हस्तेन शिवोक्तं तं न्यवेदयत् । तच्छ्रुत्वा रावणश्चापि समतिक्रम्य तां निशाम् ॥३३॥
चकार पूर्ववद्गानं द्वितीयदिवसे पुनः । नन्दिना शंकरश्चापि पूर्ववत्तं न्यवेदयत् ॥३४॥
इत्थं दश दिनान्येव गतानि रावणस्य च । अथ तत्कर्मणा तुष्टः शङ्करो गायनेन च ॥३५॥
भूत्वा प्रसन्नस्तं प्राह वरं वरय चेति वै । दृष्ट्वा शंभुं रावणोऽपि शिरासा तेन संधितः ॥३६॥
वरयामास मन्मात्रे ह्यात्मलिंगं तथा मम । पत्न्यर्थं पार्वतीं देहि तथेत्युक्त्वा ददौ शिवः ॥३७॥
गृहीत्वा गंतुकामं तं पुनः प्राह हरस्तदा । मतोपार्थं त्वया वीर दशवारं निजं शिरः ॥३८॥
खङ्गेन छेदितं यस्मात्तस्मात्तेऽद्य शिरांसि हि । दश विंशद्भुजाश्चापि भविष्यन्ति गिरो मम ॥३९॥
ततः स रावणस्तुष्टो गिरिर्जालिंगमभ्युतः । विंशद्भुजो दशग्रीवः सम्प्रत्थ गन्तुमुद्यतः ॥४०॥
कल्पभेदाच्छतशिराः शतवारं प्रमादितैः । स प्रोक्तः स्वशिरोभिर्हि शतद्वयभुजः कचित् ॥४१॥
तस्माद्धि हृतवान् विष्णुस्त्वं तं मार्ग प्रतार्य च । तयोश्चाधस्तटे लिंगं गोकर्णं रावणात्तथा ॥४२॥
गृहीत्वा स्थापितं पूर्वं रावणोऽपि गृहं ययौ । मंदोदरीं हरैर्वोक्त्यल्लभ्वा मयसुतां शुभाम् ॥४३॥
मातुः कार्यमसंपाद्य तूष्णीमेवातिलज्जितः । मन्दोदर्याऽभवन्स्वीयं विवाहं चोपपूरितः ॥४४॥
दृष्ट्वोदा धनाध्यक्षं पुष्पकस्थं तु कैकसी । पुत्रान् धिक्कारयामास यूयं पढा मृतोपमाः ॥४५॥
मापत्न्याश्चैषु ये दृष्ट्वा जायते नात्र लज्जिताः । ते मातृवचनं श्रुत्वा ययुर्गोकर्णमुत्तमम् ॥४६॥
दशवर्षसहस्राणि कुम्भकर्णोऽकरोत्तपः । विभीषणोऽपि धर्मात्मा सत्यधर्मपरायणः ॥४७॥


'भलिए तुम अपने स्थानको वापस चले जाओ' ॥ ३०, ३१ ॥ ऐसा कहकर उसको उनके स्थानपर भेज
दा, नन्दीश्वर शिवका यह बचन सुनकर रावणके पास गये । ३२ ॥ उन्होंने अपने हाथसे उसका सिर
धड़से जोड़कर शिवका वचन उसको कह सुनाया। रावण यह सुनकर भी उस रातको वहीं रहा और दूसरे दिन
फिर उसी विधिसे शिवजीका गुणगान करने लगा । शिवजीने उस दिन भी अपना संदेश नन्दीके द्वारा रावण
का कहल भेजा । परन्तु रावणने फिर भी अपना गायन उसी प्रकार दस दिनतक जारी रक्खा । तब शंकरजी
उस उम्र भयानक कर्म तथा मनोहर गायनसे प्रसन्न हो गये और उससे कहा-वर मांगो । ऐसा कहकर
शिवजी ने उसका वह सिर भी धड़से जोड दिया, तब उसने शंभुसे वर माँगा कि आप मेरा माताके लिए आत्म-
लिंग तथा पत्नी बनानेके लिए मुझे पार्वती जीको दे दें जिये । 'तथाऽस्तु' कहकर शिवजीने उसको वे दोनों चीजें
दे दीं । ३३-३७ ॥ जब उनकों लेकर रावण चलने लगा, उस समय शिवजी कहने लगे-हे वीर ! तुमने
मुझको प्रसन्न करनेके लिये अपना सिर दस बार तलवारसे काटा है। इसलिए मेरे कथनानुसार तुम्हारे दस
मिर तथा बीस भुजायें हो जायेंगी ॥ ३८ ॥ ३९ ॥ तब रावण प्रसन्नतापूर्वक दस सिर और बीस हाथवाला
बनकर पार्वती तथा शिवलिंग लेकर अपने स्थानकी ओर चला ॥ ४० ॥ कहीं-कहीं कल्पभेदसे रावण सौ बार
मस्तक काटनेसे सौ सिर तथा दो सौ हाथोंवाला भी कहा गया है । ४१ ॥ बादमें रास्तेसे ही विष्णुभगवान्
रावणके हाथसे तुमको (पार्वतीको) छीन ले गये । तब तुम (पार्वती) भी श्रीहरिको धोखा देकर उनसे
अदृश्य हो गयीं । विष्णुकी तरह तुमने रावणके हाथसे शिवलिंग भी छीन लिया और उस लिंगको समुद्रके
किनारेपर ही गोकर्ण नामसे स्थापित कर दिया। तब रावण खाली हाथ लौट गया और विष्णुके कथनानुसार मय
राक्षसकी सुन्दरी पुत्री मन्दोदरी उसको प्राप्त हुई ॥४२॥४३॥ माताके कार्यका सम्पादन न कर सकनेके कारण
वह बहुत लज्जित हुआ और कुछ भी नहीं कह सका । पश्चात् मन्दोदरीके साथ विवाह करके वह सन्तुष्ट हुआ
॥ ४४ ॥ एक समय उसकी माता कैकसी धनपति कुबेरको पुष्पक विमानपर बैठा देखकर अपने पुत्रोको धिक्कार-
कर कहने लगी कि तुम लोग नपुंसक तथा मृतक सदृश हो ॥ ४५ ॥ अपने सोतेले भाईका उत्कर्ष देखकर
तुम लोगोंको लज्जा नहीं आती' माताके इस कटु वचनको सुनकर वे तीनो भाई पूजनीय गोकर्ण महादेवके पास
गये ॥ ४६ ॥ वहाँ कुम्भकर्णने दस हजार वर्ष तपस्या की। धर्मात्मा विभीषणने भी सत्यधर्मपरायण होकर