श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात
Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)
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Read in contextसर्गः ९ ] सारकाण्डम् ८५
त्रपाथ भीषयन्तीनां बहुशुश्राव संमदः । धृत्वा करेण तत्पाणिं मन्दोदर्या निषेधितः ॥८४॥
नादृष्टाः सन्ति बहवस्त्यजैनं कृपणां कृशाम् । ततोऽब्रवीद्दशग्रीवो राक्षसीर्विकृताननाः ॥८५॥
यथा मे वशगा सीता भविष्यति सकामना । तथा यतध्वं त्वरितं तर्जनादरणादिभिः ॥८६॥
यदि मासद्वयादूर्ध्वं मच्छय्यां नाभिनन्दति । तदा मे प्रातराशाय हत्वा कुरुत मानुषीम् ॥८७॥
तदा सीता पुनः प्राह वचनं तं दशाननम् । बाल्येन्वहेह समानीता पेटिकास्था त्वया पुरा ॥८८॥
तदा मया यत् प्रोक्तं तच्च किं विस्मृतोऽसि हि । अधुनाऽहं गमिष्यामि यास्यामि त्वरितं पुनः ॥८९॥
त्वं च पुत्रांश्च बांधवांश्च निहन्तुं च मयैषिणीम् । तन्मयाद्य वचनं सत्यं कर्तुमत्रागताऽस्म्यहम् ॥९०॥
मां बन्धून् सम्पर्यावर्त्यहरामि रामहस्ततः । ततोऽयोध्यापुरीं गत्वा पुनर्यास्यामि त्वत्पुरीम् ॥९१॥
तच्छ्रुत्वा शङ्कुकं न मातामहगृहे स्थितम् । शतशीर्षं रावणं च द्वीपांतरनिवासिनम् ॥९२॥
तत्साहाय्ये पोतुकैस्तल्लयामागतं पुनः । अहं तृतीयवेलायां सर्वाभ्यां सह वातुधा ॥९३॥
ततः स्वीयस्थलं गत्वा पुनश्च स्थाप्यहं जनान् । कुम्भकर्णोद्भवं वीरं मूलकासुरनामकम् ॥९४॥
अथवा तुर्यवेलायामागच्छ पूर्वकेण हि । अहमेव हनिष्यामि शितबाणं रणांगणे ॥९५॥
अन्यच्चापि स्मरस्य त्वं पुरा बाह्वर्जुनादितम् । यत्प्रियाञ्च त्वया गत्वा कौसल्यानृपतेः पुरा ॥९६॥
पेटिकास्थौ पुनश्च्यक्ता नाज्ञत्वे दैवयोगतः । अनन्यत्र मतुकामोऽसि यतोऽहमाहृता त्वया ॥९७॥
गच्छ गेहे सुखं भुङ्क्ष्व रामः शीघ्रं हनिष्यति । इति सीतावाक्यवाणाभिन्नममंस्थलोऽपि सः ॥९८॥
यया तूष्णीं निजं गेहं लज्जानध्र दशाननः । एवं दशानने याते राक्षस्यो रावणाज्ञया ॥९९॥
जानकीं ताः स्वशब्दैश्च तथा क्रूरोक्तिभिर्मुहुः । आख्यादीर्घप्रमुखाद्यैर्भीषयन्त्यः करालाभिः ॥१००॥
अनुज सहित राम को पराभव प्राप्त होगा और उस समय मेरी विजय होगी, तब मुझे बड़ा हर्ष होगा। इस प्रकार वार्तालाप समाप्त करके मौन हो दशानन ने जान लिया ॥८३।८४॥ तब रावण तलवार उठाकर सीता को मारने के लिए उद्यत हुआ। उस समय मन्दोदरी ने उसका हाथ पकड़कर रोका और कहा कि तुम्हारे बहुत सी स्त्रियां हैं, इस कृपण कमजोर तथा दीन व मानुषी नारीको छोड़ दो। तब रावणने उन मुखवाली राक्षसियोंसे कहा कि जिस तरह से यह सीता मेरे वशमें हो, वैसा तुमलोग उपाय करो और इसे समझाकर मेरे अनुकूल कराओ ॥८५।८६॥ यदि दो महीनेके भीतर यह मेरे शय्यापर न आय तो इसे प्रातःकालके भोजनके लिए तैयार करना, तब मैं इसे खा जाऊंगा ॥८७॥ सीता फिर दशमुख राक्षससे कहने लगी- जब तू बाल्यावस्थामें मुझे पेटारीसहित यहाँ ले आया था ॥८८॥ उस समय जो बात मैंने कही थी, क्या उसे भूल गये? मैंने कहा था कि अभी मैं जाती हूँ परन्तु फिर यहाँ तुरन्त ही आऊंगी ॥८९॥ और वह इसलिए कि मैं भाई, पुत्र तथा सेना सहित तुझ मार डालूंगी। अब मैं अपना वचन सत्य करने आई हूँ ॥९०॥ रामके हाथों तुझको और तेरे बन्धुओं तथा सेनाको मरवा-कर अयोध्यापुरी जाऊंगी, फिर मैं तीसरी बार भी तेरी नगरीमें आऊँगी ॥९१॥ उस समय मातामह के कुलमें या घरमें स्थित निकुम्भक पुत्र पोलस्कथा तथा द्वीपायतनमें रहनेवाले सो शिरवाले रावणको कि जिसकी सहायताके लिए घूम आया, तीसरी बार आकर उन दोनोंको मारूँगा ॥९२।९३॥ पश्चात् अपने स्थानको जाकर फिर चौथी बार में फिर आऊँगी और कुम्भकर्णके पुत्र वीर मूलकासुरका वध करूँगी ॥९४॥ अथवा विश्रामसे यहाँ आकर मैं इसे रणांगणमें मारूँगी ॥९५॥ पूर्वकालमें महाबाहुर्जुनने कहा था, यह भी स्मरण कर ले। जिसके कहनेसे तूने कौशल्या और राजा दशरथका हरण किया था ॥९६॥ दैवयोगसे फिर तूने उन्हें अयोध्यामें छुड़वा दिया था। इससे पता लगता है कि तू मरना चाहता है। इसीलिए तूने मुझसे प्रेम करना चाहा है। ९७॥ अब घर जा और सुखमं भोजन कर। राम तुझे शीघ्र मारेंगे। इस प्रकार सीताके वाक्यरूपी बाणसे विद्धहृदय होकर दशानन लज्जासे चुपचाप अपने घर चला गया । दशाननके चले जानेपर उसकी आज्ञासे राक्षस्योंने अपने भयानक शब्दोंसे, क्रूर वाक्योंस, मुँह फाड़कर, बलकार तथा