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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)

by पारम्परिक लोक संग्रह

Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)

DevanagariHindipublished292 pages

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अकबर बीरबल विनोद ८०
हाथी की तरह झूमना प्रारम्भ करता है। पाँचवीं बार गधा
बना देता है। छठवें में मद्यपी नशे में गुप्त हो जाता है, यहाँ
तक कि उसको अपने शरीर तक की भी सुधि बुध नहीं
रहती। यही कारण था कि अन्त में मैंने शराब का नाम
लिया था।" एक बोतल में केवल छः प्याला शराब रहती
है। प्रत्येक प्याला सेवन के पश्चात् मनुष्य की पृथक पृथक
दशाएँ हो जाती हैं।
बादशाह बीरबल की इन बातों को बड़े ध्यान पूर्वक सुन
रहा था कारण कि उसे इस बात का पहले ही से विश्वास
था कि बीरबल जो कुछ भी कहे वा करेगा उसके अच्छे
के लिये ही। बीरबल का अभिप्राय भी बादशाह का
मद्य पान छुड़ाना ही था। उस की इस शुभ कांक्षा से
बादशाह बड़ा हर्षित हुआ और उसे उचित पुरस्कार देकर
बिदा किया।
शिर के बाल मुड़वा दूँगा।
दिल्ली नगर में एक बड़े सुप्रतिष्ठित और विद्वान ब्राह्मण
रहते थे, उनके श्रेष्ठाचरण से दरबार में उनका बड़ा सम्मान
था। पंडित जी का स्वभाव था कि वे बिना समझे बूझे
किसी कार्य्य में हाथ नहीं डालते थे और जिस बात को
मुख से एक बार कह देते उसको प्राणप्रण से पालन करते थे।
उनसे उनका भृत्य समुदाय सदा भयभीत रहता। एक
दिन ऐसी घटना घटी, जब उक्त पंडित जी चौके में