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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)

by पारम्परिक लोक संग्रह

Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)

DevanagariHindipublished292 pages

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अकबर बीरबल विनोद ६४
पहले भी एक बार नौकर के हाथ रुपया सूद के सहित भेज
दिया था, परन्तु यह रुपया लेने से इन्कार कर मेरे से एक
सेर मांस मांगता है। सरकार इस पर भलीभाँति विचारकर
उचित न्याय करें।"
साहूकार और दीनदयाल के अन्तरगत तय पाई शर्तों को
सुनकर काजी बोला-"इसका न्याय अब हमारे बूते का नहीं
है, न्याय तो तुम्हारा शर्तनामा ही कर रहा है। मैं हुक्म देता
हूँ कि यह मारवाड़ी इसी समय आपके शरीर का एक सेर
मांस अपनी इच्छानुसार काटकर ले लेवे।" दीनदयाल के
रहे सहे होस हवास भी जाते रहे। बड़ा चिन्तित हुआ अन्त
में कुछ सोच समझकर काजी से बोला-"मैं इस मामले को
शाहनशाह के पास ले जाऊँगा, कृपया आप अपने आर्डर को
तब तक के लिये मंसूख रक्खें जब तक कि वहाँसे कुछ फैसला
न हो जावे।" काजी को लाचार होकर उसकी अर्जी मंजूर
करनी पड़ी। उस मारवाड़ी को एक महीने की मुद्दत देकर
काजी ने अपना काम समाप्त किया।
दीनदयाल दूसरे ही दिन बादशाह की अदालत में समय
से पेस्तर जा पहुँचा, और बादशाह को अदब से सलाम कर
उदास मुख एक तरफ आसन लगाकर बैठ गया। उस समय
बादशाह अपने फौज का प्रबन्ध कर रहे थे। जब वह काम
शेष हो गया तो उनकी दृष्टि दीनदयाल पर पड़ी। उसका
चेहरा उतरा हुआ देखकर बादशाहने उसके उदासी का कारण
पूछा। दीनदयाल अपने और मारवाड़ी के बीच जो कुछ
मामला चल रहा था ब्योरेवार कहकर समझाया। यह एक