अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)
by पारम्परिक लोक संग्रह
Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)
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और मेरे व्योपार में धक्का पहुँचाने की नीयत से आपके पास
झूठा अर्जीदावा लेकर आया है, इसकी जाँच कराने पर
आपको स्वयं झूठ सचका पता चल जायगा, इस संबन्ध में,
मैं और कुछ कहना नहीं चाहता।
बीरबल ने उसकी बात मानकर उसको घर जाने की
मुहलत दी। फिर पहले व्यापारी को बुलाकर बोला—
“इस मामले में आपको अभी खामोश रहना पड़ेगा, समय
पाकर मैं इसका उचित न्याय करूँगा। अभी आप इस ढङ्गसे
रहें मानों कुछ हुआ ही नहीं है। वह बीरबल की बात
मानने को लाचार था, चुप चाप अपने घर चला गया।
व्योपारियों के झगड़े का न्याय करना बीरबल को याद
रहता, सोचते २ एक दिन उसे एक नई युक्ति सूझी।
बजार से चार घी से भरे कुप्पे मँगवाये गये जिनमें कुछ अपना
अलग २ निशान बनाकर दो खास कुप्पों में एक-एक मोहरें
डाल दीं। फिर दोनों व्योपारियों को बुलवाकर बोला-“देखो
यह चार घी के कुप्पे मेरे पास बहुत दिनों से पड़े हुए हैं
अब इनके नष्ट होने का भय है, तुम दोनों इसमें से एक एक
कुप्पा अपने साथ लेजाओ; बाकी दो कुप्पे मैं दूसरे व्यापा-
रियों के हाथ बेंच दूँगा। कुप्पों को बाज़ार में उचित दाम
पर बेंचकर जो मिले उसमें से अपना नफा निकाल शेष
मूल्य मेरे हवाले करना।” बादी तो कुछ इतराज न किया,
परन्तु दूसरा व्योपारी (यानी प्रतिवादी) बोला-“दीवानजी !
इतने थोड़े घी के लिये चार व्योपारियों का क्या काम है,
आप एक ही को चारो सुपुर्द कर दें। वह बेंचकर सबका