अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)
by पारम्परिक लोक संग्रह
Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)
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अवश्य मिलूँगो । इस समय बादशाह के साथ और बहुत से
लोग आये हुए हैं, मैंउनके सामने नहीं मिल सकती” स्वर्गीय
परी का ऐसा सन्देशा सुनाकर बीरबल फिर बोला-“पृथ्वि-
वीनाथ ! मुझे भी मुनासिब यही जान पड़ता है। हम लोग
उसकी मरजी के अनुसार चलें, नहीं तो यदि हमारे ब्योहारों
से ऊबकर कहीं वह रुष्ट हो गई तो फिर बना बनाया
काम बिगड़ जायगा। इस समय लौट ही चलना बुद्धि-
मानी है।
कोई उपाय कार्यान्वित होते न देख बादशाह लाचार
होकर मनगढंत परी की आज्ञा पालन करता हुआ नगर
की तरफ चला। आगे २ बीरबल उसके पीछे बादशाह और
सबके पीछे कतार से अन्य लोग चल रहे थे। बीरबल और
बादशाह तो कपड़े पहने हुये थे लेकिन पीछे वाले सब नग्न
शरीर केवल एक लगोटी पहने हुये थे। बादशाह विमुख
लौटने के कारण बड़ा दुखी था; लेकिन चूँकि परी ने रात
को उससे मिलने का वादा किया था इससे भीतर भीतर
कुछ धैर्य भी बँधा हुआ था। इस प्रकार सबको लिये हुए
बीरबल नगर में पहुँचा। शहर के रईसों को यों नंगधड़ंग घूमते
देख नागरिकों को हँसी आने लगी। यह दल लिये
हुये बीरबल जिस गली से होकर जाता वहाँ के लोग इन
को देखकर हँस पड़ते। जब इनसे रहा न गया तो नागरिकों
को डाटकर बोले-“तुम लोग बड़े मूर्ख हो जो हमको देखकर
हँस रहे हो, तुम्हें मालूम नहीं कि बीरबल हम को स्वर्गीय
आनन्द लुटा रहा है। हमारे इन पवित्र वस्त्रों को मृत्युलोक