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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)

by पारम्परिक लोक संग्रह

Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)

DevanagariHindipublished292 pages

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अकबर बीरबल विनोद ४०
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लगा। घप तुरत बीरबल से बोला-“बीरबल ! उसको यहाँ
लिवालावो ।” बीरबल बादशाह की बात काटते हुए बोला-
“पृथ्वीनाथ ! वह स्वर्ग की परी है, पैदल चलकर यहाँ
नहीं आ सकती; हाँ यदि आप स्वयं चलकर उसे लिवा
लावें तो भले ही आपके प्रेम में पड़कर शायद चली आवे ।”
वह तो दीवान के मुख से परी की प्रशंसा सुनकर मात हा
चुका था, इनकार कब करता। तत्काल सवारी तैयार करने
की आज्ञा दी और आप भी कपड़े लत्ते से लैस हो गया ।
थोड़ी देर बाद सवारी तय्यार होकर आन पहुँची, सभा
के लोग पहले ही से सुसज्जित थे, सब लोग नगर से बाहर
निकले। जिस समय बादशाह की सवारी इस ठाट बाट से
निकली देखते ही बनती थी, अगर कोई अपरिचित मनुष्य
उस समय के समाज को देखता तो उसकी और उसके वैभव
की 'भूरि २ प्रशंसा करता ।
मध्याह्न में बादशाह पहाड़ी के समीप जा पहुँचा, धूप बड़ी
तेज पड़ रही थी । धूप की लपट महल के शीशों पर पड़ने से
उसका प्रतिबिम्ब बहुत दूर तक पहुँचता था, जिससे महल
की शोभा दिन दूनी रात चौगुनी हो रही थी । दृष्टि पड़ते ही
आँखें चौंधिया जाती थीं । बादशाह ऐसे अपूर्व महल को देख
सारे महलों की उत्तमता भूल गया और बीरबल के आग्रह
से अपनी मण्डली सहित पहाड़ी पर चढ़ने लगा । थोड़ी
देर चलकर महल के नीचे जा पहुँचा और महल की
सुन्दरता देखने लगा ।
बीरबल बोला-“गरीबपरवर ! ऊपर दृष्टि फैलाकर