Skip to content
SarvaKosh
अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)

by पारम्परिक लोक संग्रह

Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)

DevanagariHindipublished292 pages

Page 50 of 292

Read in context
Page 50

अकबर बीरबल विनोद ३६
से किया जाय और महल एक ही रात में बनकर तय्यार
हो। महल रातो-रात बनकर तय्यार हो गया। कारीगरों ने
भली-भाँति दस्तकारी दिखलाई। लकड़ी पर इस सफाई से
रोगन किया कि कोई भी देखकर नहीं कह सकता था कि
वह लकड़ी का बना है। स्थान-स्थान पर शीशों को ऐसी
खूबी से जड़ दिया कि उसकी चमक कोसों तक फैलती थी।
तब बीरबल खूब साफ सुथरे वस्त्रों से सुसज्जित होकर
उस नये महल में आबाद हुआ। सबेरा होते ही वह बड़े ठाट
बाट से सजकर नगर में पहुँचा। एक वर्ष का विश्राम पाकर
बीरबल खूब तगड़ा हो गया था। अच्छी सेवा होने से उसके
शरीर के अंग प्रत्यंग खिल गये थे। नगर में जाते समय उसे
देखकर किसी को बीरबल होने का भ्रम न हुआ। इस प्रकार
देखता भालता राजदरबार में जा पहुँचा। एक लब्ध प्रतिष्ठ
आगन्तुक को देखकर सभासदगण एकटक उसी की तरफ
देखने लगे, सभा का काम बन्द होगया; परन्तु किसी ने
उसको छेड़ा नहीं। अन्त में कुछ देर बाद बादशाह ने पूछा-
"आप कौन हैं! कहाँ से आये हैं, और यहाँ आने का क्या
प्रयोजन है?" बादशाहके ऐसे अपरिचितों से प्रश्नों को सुन
कर बीरबल बोला-"गरीबपरवर! मैं आपका पुराना दीवान
बीरबल हूँ।" बादशाह भौंचक सा हो गया और रुखाई से
बोला-"अर्य! बीरबल; तू तो मर गयाथा न, फिर सजीव कैसे
लौटा। बीरबल ने उत्तर दिया-"हुजूर! मैं मर तो गया था
परन्तु जब स्वर्ग लोक को गया तो इन्द्र मुझपर प्रसन्न होकर
मुझे अपना मंत्री बना लिया, तबसे मेरा दिन बड़ा