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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)

by पारम्परिक लोक संग्रह

Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)

DevanagariHindipublished292 pages

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१५ अकबर बीरबल बिनोद
कपड़े क्यों धो रही है ?" लड़की ने देखा कि बादशाह क्रोध
से तमतमा गया है इसलिये काँपती हुई गिड़गिड़ाकर लड़-
खड़ाती जुबान से बोली-“श्रीमान ! श्रीमान् ! मैं तो"......!
बादशाह को उसे घबड़ाई हुई देखकर दया आ गई और उसे
शान्त्वना देते हुए बोला-“तू इतना घबड़ाती क्यों है, यदि
साफ २ बतला देगी तो तुझे माफी दी जायगी अन्यथा बहुत
कष्ट उठायेगी ।” लड़की ने कहा-“पृथ्वीनाथ ! मुझे इस
समय नितान्त आवश्यकता पड़ी है जिस कारण विवश हो
कर कपड़े धोने आई हूँ ।”
बादशाह ने कहा-“ऐ अभागी ! ऐसी कौन सी जरूरत
थी जिसके लिये तू इतना परेशान है ।”लड़की ने उत्तर दिया-
“क्या कहूँ, पृथ्वीनाथ ! आज दोपहर में मेरे पिता को लड़का
पैदा हुआ है सो मैं दिन भर तो और और कामों में परेशान
थी इस वक्त फुरसत पाने पर कपड़े धोने आई हूँ । क्योंकि
साफ कपड़ों की आवश्यकता आन पड़ी है ।”
लड़की के ऐसे कौतूहलपूर्ण उत्तर को सुन बादशाह बड़ा
आश्चर्य-चकित हुआ और उसे फटकारते हुए बोला—"ऐ
नादान छोकरी ! तू क्या बकती है ! क्या तेरा दिमाग खब्त
तो नहीं हो गया है, भला पुरुष को भी कहीं लड़का पैदा
होता है ?” लड़की सुअवसर देखकर विनम्रता पूर्वक
बोली-“पृथ्वी नाथ ! जब पुरुष को लड़का नहीं हो सकता
तो बैल को दूध कैसे होगा ?”
बादशाह को अपनी पहली बात स्मरण हो आई चकित
होकर लड़की से पूछा-“क्या तू बीरबल की लड़की तो नहीं है?”