अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)
by पारम्परिक लोक संग्रह
Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)
Page 274 of 292
Read in contextअकबर बीरबल विनोद २६२
करने का उसे साहस न हुआ । घर पहुँच कर भी उसका मन
'चल ही रहा । इस चिन्ता के गहरे आघात से उसे शामको
क्षुधा भी न लगी और न रात्रि में खूँखार निद्रा ही आई ।
एकदम अचेतन अवस्था में ही तमाम रात व्यतीत हो गई।
मारे लज्जा के अपने घर वालों से भी कुछ कहते नहीं बना ।
दूसरे दिन सबेरा होते ही बादशाह बीरबल के जेवनार की
तय्यारी कराने लगे । भिन्न २ प्रकार के जेवनार तय्यार
कराये गये । इस खुशहाली में नगर के बहुतेरे अमीर
उमराव मुसलमान आमंत्रित किये गये । जब जेवनार
का समय हो गया और अन्य मेजमान लोग एकत्रित हुए तो
बादशाह ने अपने एक कर्मचारी द्वारा बीरबल को बुलवा भेजा ।
खाद्य पदार्थ भलीभाँति सजाकर सोने और चाँदी के बासनों
में परसे गये और सब अमीर उमराव यथास्थान बैठ गये ।
उधर जब बादशाह का दूत बीरबल के पास पहुँचा तो
उसका मुख मलीन हो गया। वह अपने दरबारी कपड़े
पहन कर उस दूतके साथ हो लिया। रास्ते में वह बराबर
अगल बगल के मार्ग की भूमि का संशोधन करता हुआ
चलता था। दैवात् उसके मन में एक युक्ति अचानक समा गई।
वह एक सुनार को सूअर की कूँची से आभूषणों को साफ करते
हुए देखा। वह तुरत सुनार के पास जा पहुँचा और आग्रह
करके उससे सूअर के बाल की कूँची मँगनी माँग ली ।
महल में पहुँच कर बीरबल ने देखा कि सब लोग यथास्थान
बैठकर केवल उसकी ही प्रतीक्षा कर रहे हैं।
बादशाह बड़े प्रसन्न दिखलाई पड़ते थे । आज उन्होंने