अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)
by पारम्परिक लोक संग्रह
Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)
Page 272 of 292
Read in contextअकबर बीरबल विनोद २६०
था। दूसरे वे बीरबल के रहते हिन्दू धर्म के प्रतिकूल कोई
काम भी नहीं कर सकते थे जिस कारण वे भीतर भीतर बीर-
बल से बहुत द्वेष रखते थे। एक दिन मुसलमानों ने गुट बाँध-
कर बादशाह का बीरबल से अविश्वास कराने का प्रण किया।
वे झूठा झूठा फरेब रचकर दावा दायर करने लगे, परन्तु
बीरबल अपने बुद्धि और विचार के बल से उनकी किल्ली
लगने नहीं देता था। ऐसा सोच समझकर न्याय करता कि
मुसलमान लोग दाँतों तले अँगुली दाबकर रह जाते। बाद-
शाह को मुसलमानों की ऐसी अनीति बहुत खलती थी, परन्तु
फिर भी उनको छेड़ता नहीं था। एक दिन उसके मन में
यह बात आई कि इन सब फसादों का एकमात्र कारण
बीरबल का हिन्दू होना ही है, यदि वह किसी प्रकार समझा
बुझाकर मुसलमान बना लिया जावे तो फिर उससे मुसल-
मानों की बगावत मिट जावे।
ऐसा निश्चय कर बादशाह ने बीरबल को मुसलमान बनाने
की एक सरल युक्ति ढूँढ़ निकाली। वह जब महल में भोजन करने
जाता तो बीरबल को भी भोजन करने के लिये आग्रह कर्ता, परन्तु
बीरबल कोई न कोई युक्ति लड़ाकर उसे टाल देता था। इस प्रकार
बादशाह को आग्रह करते और बीरबल को टालते कई महीने
व्यतीत हो गये। न बीरबल उनके साथ भोजन करने जाता और न
बादशाह की मंशा वर आती। एक दिन बीरबल अपने कामों में
दत्तचित्त होकर लगा हुआ था इसी बीच बादशाह ने कहा-
"बीरबल कल दोपहर में यहीं भोजन करना।" बीरबल ने
सपर बिना विचार किये ही कामों की विशेषता के कारण