अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)
by पारम्परिक लोक संग्रह
Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)
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Read in contextअकबर बीरबल विनोद २५६
आ गया है, हरि इच्छा। प्रगट में बादशाह को यह शेर
पढ़कर सुनाया—
“आना नहीं मुश्किल है कुछ नाखून का।
फूल गर गूलर के हों वा रोम हो भल्लूक का ॥”
उसके उपरोक्त शेर को सुनकर बादशाह अपने दीवान को
दोनों वस्तुओं को यथाशीघ्र मँगवाने की आज्ञा दी। दीवान
अपने निमक खाये भर परिश्रम करके थक गया; परन्तु उसे
सफलता न मिली। उधर एक महीने की शर्त भी पूज गई।
बादशाह को लाचार होकर सब कैदी वैद्य और हकीमों को
जेल से मुक्त कर देना पड़ा। बादशाह ने कैद से छूटे हकीम वैद्यों
को बुलवाकर उपरोक्त दवाका गुण पूछा- “बीरबल उन्हें पहलेही
से सावधान कर चुका था इसलिये वैद्यों और हकीमों ने बीरबल
की दवा की बड़ी तारीफ की। बादशाह को कहीं से बीरबल
का छिद्रान्वेषण करने की जगह न मिली। अतएव वह उसे
एक उत्तम कोटि का हकीम समझकर उस पर रुष्ट नहीं हुआ।
बिचारे हकीम कैद से छूटकर उसे बहुत दुआ दिये और
सभों ने आपस में सहयोग कर अपने प्राणरक्षक को एक
अच्छी रकम भेट दीं। बीरबल वहाँ से चलकर कई दिनों
के पश्चात दिल्ली पहुँचा और बादशाह के सामने वहाँ का
आद्योपान्त समाचार कहकर सुनाया, बादशाह ने बीरबल
के बुद्धिमानी की बड़ी प्रशंसा की ओर अन्य दरबारी भी सब
तरफ से वाह वाह करने लगे।