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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)

by पारम्परिक लोक संग्रह

Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)

DevanagariHindipublished292 pages

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अकबर बीरबल बिनोद १२
तोते के रक्षक को दे दिया। इस प्रकार विचारे सेवक की
प्राणरक्षा हुई और उसे धन भी मिला।
बैल का दूध ।
एक दिन की बात है कि अकबर और बीरबल दोनों
एक उपवन में बैठे हुये आनन्द मना रहे थे इतने में शाम होगई ।
जब बीरबल घर जाने को उद्यत हुआ तो बादशाह ने उसे
रोककर कहा-"बीरबल ! आज कई दिनोंसे मैं एक बात सोच
रहा था, परन्तु तुमसे कहना भूल जाता था। एक हकीम दवा
बनाता है उसमें बैल के दूध की अनिवार्य आवश्यकता है।
यदि तुम कहीं से उसे ला दो तो अति उत्तम हो । "पत्ता
खड़का बन्दा भड़का।" बीरबल बादशाह की मन्शा समझ
गया और मनमें कहा कि बादशाह इस बहाने मुझे मूर्ख
बनाना चाहते हैं।
बीरबल बोला-"इसमें घबड़ाने की कौनसी बात है, मैं एक
सप्ताह में बैल का दूध ला दूँगा।" बादशाह ने कहा-"दो-चार
दिन और अधिक लग जायें तो कोई चिन्ता की बात नहीं है,
परन्तु दूध का आना बहुत लाजिमी है।" "बहुत अच्छा"
-कहता हुआ बीरबल वहाँ से बिदा हुआ।
वह-घर पहुँच एकान्त स्थान में बैठकर बैल के दूध वाले
प्रश्न पर विचार करने लगा। चिन्ताग्रस्त बीरबल को कई
घण्टे का समय मिनटों के समान बीत गया। जब भोजन
करने का समय हुआ तो नियमानुसार उसकी लड़की बुलाने