Skip to content
SarvaKosh
अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)

by पारम्परिक लोक संग्रह

Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)

DevanagariHindipublished292 pages

Page 190 of 292

Read in context
Page 190

[Header]
१७६ अकवर बीरबल बिनोद

और वह बादशाह से निवेदन कर बोला-“पृथिवीनाथ!
जब बीरबल को भाग्य की प्रधानता मालूम है तो
इसका कोई सबूत भी होगा। बादशाह ने झट बीरबल से
पूछा-“हाँ बीरबल ! इस बात का कोई सबूत दो ।” बीरबल
बोला-“पृथिवीनाथ ! यह कोई ऐसी वैसी बात नहीं है जो
कोई गाँठ में बाँधे फिर रहा हो और तुरत खोलकर दिखला
दे, आपकी ऐसी ही इच्छा है तो कुछ दिनों में सिद्ध कर के
दिखला दूँगा ।” उस दिन का कार्य्य समाप्त हुआ और लोग
अपने २ घर गये ।
एक दिन बादशाह को जमुना में सैर करने की इच्छा हुई
अतएव कुछ दरबारियों को साथ ले एक खास नौका पर बैठकर
यमुनाजी में जल विहार करने लगा-बीच दरिया में पहुँच कर
फिर उसे भाग्य और उद्योगवाली बात स्मरण हो आई, उसने
बीरबल से कहा-“क्यों बीरबल! अभी तुम्हारा दिमाग ठिकाने
आया की नहीं-“बोलो उद्योग को प्रारब्ध से प्रधान मानते हो
वा नहीं ?” इस बार भी बीरबल ने पहले ही सा उत्तर
दिया । बीरबल की इस हठधर्मी पर बादशाह चिढ़ गया और
तत्क्षण अपने हाथ की अँगूठी निकालकर जमुना जलके मध्य
में छोड़ दिया और बोला-“अच्छा बीरबल ! यदि अपनी भाग्य
की प्रधानता से तू एक मास के अन्तरगत यह अँगूठी मुझे न
मिला सकेगा तो तेरी गर्दन उड़ा दी जायगी ।”
बादशाह के उस आकस्मिक कोप से सब लोग थर्रा
गये । सब लोगों ने देखा कि यहाँ पर जमुना जी का जल
बहुत गहरा है। यहाँ से अँगूठी का मिलना असम्भव हो