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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)

by पारम्परिक लोक संग्रह

Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)

DevanagariHindipublished292 pages

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अकबर बीरबल विनोद १६५
बीरबल के बतलाये क्रमानुसार सूर्य्य को दण्ड प्रणाम करने
लगा । उधर बीरबलने उसके खाने पीने का अच्छा प्रबन्धकर
दिया। पौष्टिक पदार्थ खाने को मिलने से चार महीने में
वह मुटाकर लड़की का कुन्दा हो गया। तब बीरबल ने
लुहार को आर्डर देकर एक सुन्दर डंडा बनवाया, उसमें
स्थान २ पर ऐसे लोहे जड़वा दिये कि वह खासा लुहाँगी
बन गया। बीरबल उस लुहांगी को उसे देकर बोला-
“देखो लोगों के पूछने पर इस लुहांगी को अपना गुरुभाई
बतलाना । फिर उसे भलीभाँति शिक्षित कर उसको
घर भेज दिया।
इधर रामबाई नित्य के जूतों का हिसाब जोड़कर उसका
घाटा जोड़ा करती थी। जब उसका पति पाँच महीने में हृष्टपुष्ट
होकर आया तो वह देखकर बड़ी प्रसन्न हुई। कहाँ तो बिचारा
थकामांदा मंजिल मार कर आया था, कहाँ उसे जूता जमाने
की सूझी। वह कुल्टा पतिको जूता खानेके निश्चित स्थान पर
ले गई, वह चुप चाप बैठा रहा, परन्तु अपने गुरुभाई यानी
लुहाँठी को नहीं भूला। ज्योंही उसकी स्त्री ने उसके सिरपर
पहला जूता लगाया कि वह उठकर लुहाँठी को तानकर
उसके सिर पर ऐसा जमाया कि उसका सिर भन्नाने
लगा-वह बोली-“अरे ! राम राम यह तो मार ली रे।”
पति ने थोड़ा अन्तर देकर एक दण्डा और जमाया।
अभी तीसरा मारने ही जा रहा था कि इतने ही में अड़ोस
पड़ोस के कुछ लोग जमा हो गये और पीछे से उसका हाथ
पकड़ लिये। स्त्री डर के कारण काँपने लगी और उसने