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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)

by पारम्परिक लोक संग्रह

Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)

DevanagariHindipublished292 pages

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अकबर बीरबल विनोद १६०
क्योंकर बढ़ सकती है। हमारे राज्य में तो अत्याचार भरसक
नहीं होने पाता है। गरीब प्रजा पर अत्याचार न करना और
उसका भलीभाँति पालन पोषण करना ही आयुवर्धक वृक्ष है
बाकी सारी बातें मिथ्या हैं।
दो०-दुर्बल को न सताइये, जाकी मोटी हाय।
मुए खाल को स्वाँस सों, सार भसम ह्वै जाय॥
इस प्रकार समझा बुझाकर बादशाह ने उस एलची को
उसके साथियों सहित स्वदेश लौट जाने की आज्ञा दी और
उनका राह खर्च भी दिया गया। वे तुर्किस्तान में पहुँच
कर यहाँ की सारी बातें अपने बादशाह को समझाया।
अकबर की शिक्षा को सुनकर बादशाह दरबारियों सहित
उसकी भूरि भूरि प्रशंसा करने लगा।

जूते की मार
अकबर बादशाह के राज में दिल्ली के निकट ग्राम में
एक स्त्री रहती थी। उसका दिमाग बहुत चढ़ा हुआ था, जिस
कारण वह नित्य अपने पति को दस जूते मारा करती थी।
उसको एक पुत्री भी थी। जब वह सयानी हुई तो उसके
विवाह की चरचा छिड़ी। उसने वर के लिये दूर २ के गाँवों
में अपना पैगाम भेजा, परन्तु कोई उस कन्या से अपने
लड़के का विवाह करने के लिये राजी न हुआ। कारण कि
सबको उस कन्या के माता की करतूत मालूम थी। वे लोग