अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)
by पारम्परिक लोक संग्रह
Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)
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और आशा है कि कुछ ही देर बाद मेरे आधीन भी हो जायगा।”
इस आनन्दवर्धक समाचार को सुनकर बादशाह के रोम २
प्रफुल्लित हो गये और बीरबल को नीचा दिखलाने के
अभिप्राय से बोला-“कहो अब भी आस्था को पीर से प्रधानता
देने को तय्यार हो वा नहीं। देखो इधर मनौती की और उधर
से शुभ समाचार आ पहुँचा।” बीरबल बोला-“पृथिवीनाथ !
बिना आस्था के हुए आपने पीर पर मन्नत नहीं की थी। यदि
आप की पीर पर आस्था न हुई होती तो आप कदापि मानता
न मानते; मुख्य आस्था ही है।” बादशाह ने कहा-“अब तुम
अपनी धींगाधींगी बन्द करो, मुझे इस पर यकीन नहीं होता।
चूँकि अभीतक तुम आस्था की प्रधानता सिद्ध नहीं कर सके
हो अतएव मरने के लिये तय्यार हो जाओ।” बीरबल ने
कहा-“मैंने आपको बहुतेरा समझाया, परन्तु आप नहीं मानते
फिर इसमें मेरा क्या अपराध है।” बादशाह बीरबलके इस उत्तर
से क्रोधित होकर बोला-“अब मैं तुमको इस अपराध का
दण्ड स्वयं अपने हाथ से दूँगा, !तुम्हारा काल आज तुम्हारे
सिर पर चढ़कर बोल रहा है। क्या कोई हाजिर है, जाकर
तुरन्त एक बधिक को बुला लाओ।”
बादशाह का रुख ताड़ कर बीरबल ने मन में निश्चय
कर लिया कि अब और अधिक टाल मटोल करने से बाद-
शाह अपने क्रोध को सम्हाल न सकेगा अतएव यकीन शाह
को हाथ जोड़कर बोला-“हे यकीन शाह जो आज मैं जीता बचा
तो आपकी कब्रपर मिठाई चढ़ाऊँगा और इस कबर के
ऊपर एक सुन्दर मकबरा निर्माण करा दूँगा।” बीरबल के