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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)

by पारम्परिक लोक संग्रह

Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)

DevanagariHindipublished292 pages

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अकबर बीरबल विनोद १५२
होता है।" बादशाह ने बीरबल की बात काट दी और
बोला-"भला कभी पीर से बढ़कर यकीन भी हो सकता है;
बिना पीर के हुए विश्वास कैसे होगा।" बीरबल ने कहा-"नहीं
शाहनशाह यकीन ही पीर से बड़ा है।" बादशाह उसके इस
उत्तर से कुछ झल्लाकर कहा-"बीरबल यह तू क्या कहता है,
कहीं पीर की मानता करने से वह नाखुश होता है।" बीरबल
बोला-"पीर पर विश्वास करने से फल मिलता है।" हम हिन्दू
मूर्त्तिका पूजन करते हैं, परन्तु वह मूर्त्ति हमे फल नहीं देती बल्कि
उस पर विश्वास करने से हमें देवतों द्वारा फल मिलता है।"
बादशाह को बीरबल के ऐसे उत्तर से सन्तोष नहीं हुआ
तदर्थ क्रोधित होकर बीरबल से कहा-"तुमको प्रमाणों द्वारा
सिद्ध कर दिखाना होगा कि पीर से आस्था बड़ी है।" बीर-
बल बोला-"मुझे स्वीकार है।" बादशाह ने कहा-"इसी वक्त
सिद्ध कर दिखलाओ।" बीरबल ने उत्तर दिया-"पृथ्वीनाथ!
यह काम इतना सरल नहीं है, इसके लिये अवकाश मिलना
चाहिये।" बादशाह बोला-"अच्छा, तुझे इसके लिये
एक महीने की मुहलत दी जाती है, परन्तु ध्यान रहे कि
अगर इतने समय में सिद्ध न कर सकोगे तो तुम्हारी गर्दन
उड़ा दी जायगी।" बीरबल ने कहा-"मुझे स्वीकार है।"
उस दिन का काम समाप्त हुआ। बीरबल बराबर अपना कार्य्य
पहले सा करने लगा। जब उसे मालूम हुआ कि अब
बादशाह का दिल दूसरी बातों में बहल गया है तो चार पाँच
दिनों का अन्तर देकर बादशाह के पैर का एक पघाई जूता
चुरा ले गया।