अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)
by पारम्परिक लोक संग्रह
Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)
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में एक जंगल मिला। उस जंगल के मध्य में एक तालाब
था। इनको प्यास सता रही थी अतएव उस तालाब पर
बैठकर निर्मल जल पान किया। फिर स्नान करने की इच्छा
हुई। तालाब में स्नान करने के निमित्त दो-तीन सीढ़ी नीचे
उतरते ही फूलचन्द के पैर के नीचे कोई ठोस चीज पड़ी। उसने
डुबकी मारकर उसे बाहर निकाला तो वह एक छोटी सी
सन्दूक थी। सन्दूकमें एक छोटा सा ताला बन्द था।
फूलचन्द ने ताले को पत्थर से मार-मारकर तोड़ दिया
उसमें दो बेशकीमत लाल बन्द थे। वह उनको देखकर
बड़ा प्रसन्न हुआ और अपने ज्येष्ठ भ्राता रूपचन्द को
दिखलाने के लिये बुलाया।
रूपचन्द उसकी आवाज सुनकर नजदीक गया तो देखा कि
फूलचन्द के हाथ में दो लाल हैं। वह उन लालों को अपने भाई रूप-
चन्द को दिखलाकर बोला-“भाई! यह एक लाल आप अपने पास
रक्खें और एक मैं लूँगा। रूपचन्द ने कहा-“भाई इस दौलत
को लेकर आप घर लौट चलें मैं भी यह सब तिजारती माल
बेचता हुआ थोड़े दिनों में लौट आता हूँ। फूलचन्द भाई की
आज्ञा सिरोधार्य कर घर लौटने की तय्यारी करने लगा।”
वह लाल दिखलाते हुए रूपचन्द से बोला-“भैया ! मैं घर तो
लौट जाऊँगा, परन्तु आप अपने हिस्से का लाल ले लेवें।”
रूपचन्द ने भाई को आगा पीछा समझा कर उत्तर
दिया-“भाई आप जानते ही हो कि परदेश में अपने पास
दौलत रखना कितना खतरनाक होता है अतएव यदि
आप मुझे लाल देने की इच्छा रखते हैं तो घर पहुँच