Skip to content
SarvaKosh
अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)

by पारम्परिक लोक संग्रह

Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)

DevanagariHindipublished292 pages

Page 101 of 292

Read in context
Page 101

८७ अकबर बीरबल विनोद

बादशाह के पास जा पहुँचा और उसे अदब से सलाम
कर उसके समीप आप भी बैठ गया। बादशाह फारस ने
पहले उसकी बड़ी आवभगत की पश्चात् उससे पूछा- "बीर-
बल ! तुमको कैसे मालूम हुआ कि मैं ही फारस का बादशाह
हूँ।" बीरबल ने उत्तर दिया-"गरीबपरवर ! आपका दृष्टि-
कोण सब पर था और सबका ध्यान आप पर था। इससे मैंने
आपको बिना परिश्रम ही आसानी से पहचान लिया।"

—०:❉:०—

सच्चे झूठे का भेद।

बादशाह और बीरबल में सिद्धान्त निरूपण हो रहा था
इसी के अन्तरगत बादशाह ने बीरबल से सच्चे और झूठे
का भेद पूछा। बीरबल ने उत्तर दिया-"पृथिवीनाथ ! इन
दोनों के मध्य उतना ही भेद है जितना कि आँख और कानों
में है।" बादशाह की समझ वहाँ तक न पहुँच सकी इस
वास्ते बीरबल से फिर पूछा- "क्यों, ऐसा काहे को होता
है?" बीरबल ने उत्तर दिया-"पृथिवीनाथ ! सुनिये, जो
बात आँखों देखी रहती है वह तो सच्ची और जो कान से
सुनी जाती है वह झूठी।" बादशाह बीरबल के युक्तिसंगत
और तर्कपूर्ण उत्तर से सन्तुष्ट हो गया।


चुप्पा सबसे भला।

एक दिन बादशाह को एक नई तरंग सूझी। उसने
बीरबल को तुरत आज्ञा दी- "बीरबल ! एक ऐसा मनुष्य