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ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished108 pages

Page 42 of 108

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Page 42

३२ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १

कर्णौ निरभिद्येतां कर्णाभ्यां श्रोत्रं श्रोत्राद्दिशस्त्वङ्निर-
भिद्यत त्वचो लोमानि लोमभ्य ओषधिवनस्पतयो हृदयं
निरभिद्यत हृदयान्मनो मनसश्चन्द्रमा नाभिर्निरभिद्यत
नाभ्या अपानोऽपानान्मृत्युः शिश्नं निरभिद्यत शिश्नाद्रेतो
रेतस आपः ॥ ४ ॥

उस विराट् पुरुषके उद्देश्यसे ईश्वरने संकल्प किया । उस संकल्प
किये पिण्डसे अण्डेके समान मुख उत्पन्न हुआ । मुखसे वाक्
और वागिन्द्रियसे अग्नि उत्पन्न हुआ । [ फिर ] नासिकारन्ध्र प्रकट हुए,
नासिकारन्ध्रोंसे प्राण हुआ और प्राणसे वायु । [ इसी प्रकार ] नेत्र प्रकट
हुए तथा नेत्रोंसे चक्षु-इन्द्रिय और चक्षुसे आदित्य उत्पन्न हुआ । [ फिर ]
कान उत्पन्न हुए तथा कानोंसे श्रोत्रेन्द्रिय और श्रोत्रसे दिशाएँ प्रकट हुईं ।
[ तदनन्तर ] त्वचा प्रकट हुई तथा त्वचासे लोम और लोमोंसे ओषधि
एवं वनस्पतियाँ उत्पन्न हुईं । [ इसी प्रकार ] हृदय उत्पन्न हुआ तथा
हृदयसे मन और मनसे चन्द्रमा प्रकट हुआ । [ फिर ] नाभि उत्पन्न हुई
तथा नाभिसे अपान और अपानसे मृत्युकी अभिव्यक्ति हुई । [ तदनन्तर ]
शिश्न प्रकट हुआ तथा शिश्नसे रेतस् और रेतस्‌से आप उत्पन्न हुआ ।

तं पिण्डं पुरुषविधमुद्दिश्याभ्य-
तपत्। तदभिध्यानं संकल्पं कृतवा-
नित्यर्थः; “यस्य ज्ञानमयं तपः”
(मु०उ० १।१।९) इत्यादिश्रुतेः।
तस्याभितप्तस्येश्वरसंकल्पेन तप-
साभितप्तस्य पिण्डस्य मुखं निर-
भिद्यत मुखाकारं सुषिरमजायत
यथा पक्षिणोऽण्डं निर्भिद्यत
उस पुरुषाकार पिण्डके उद्देश्य-
से ईश्वरने तप किया । अर्थात्
उसका अभिध्यान यानी संकल्प
किया, जैसा कि “जिसका तप
ज्ञानमय है” इस श्रुतिसे सिद्ध होता
है। उस अभितप्त—ईश्वरके संकल्परूप
तपसे तपे हुए पिण्डका मुख प्रकट
हुआ अर्थात् उसमें मुखाकार छिद्र
इस प्रकार उत्पन्न हो गया जैसे कि
पक्षीका अण्डा फट जाता है । उस