अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
by महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा
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Read in contextदशमोऽध्यायः (53)
नमामि धर्मज्ञानाभ्यां वैराग्याद्यग्नितः क्रमात्।
ऐश्वर्याय नमो धर्मज्ञानाभ्यां पूर्वतस्तथा।।10।।
अवैराग्याय च तथानैश्वर्याय नमो नमः।
इसके बाद धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्य को अग्निकोण से आरम्भ चारो
कोणों में प्रणाम। पूर्व में धर्म और अज्ञान, दक्षिण में ज्ञान और अवैराग्य पश्चिम
में वैराग्य और अनैश्वर्य तथा उत्तर में ऐश्वर्य और अधर्म को प्रणाम।
अं अर्कमण्डलायाहमुपुर्युपरि सर्वदा।।11।।
सत्त्वाय रजसे नित्यं तमसेपि नमो नमः।
चं चन्द्रमण्डलमिति ध्यात्वाध्यात्वा नमाम्यहम्।।12।।
रमग्निमण्डलायेति सम्पूज्यैव प्रयत्नतः।
विमलोत्कर्षिणीज्ञानाक्रियायोगाभ्य इत्यपि।।13।।
नमामि प्रह्वीसत्याभ्यामीशानायै दलान्तरे।
पूर्वावितोऽनुग्रहायै प्रणमामि तदन्तरे।।14।।
यन्त्र पर सूर्यमण्डल के ऊपर हमेशा सत्त्व, रजस् और तमस् को प्रणाम।
चन्द्रमण्डल को बार-बार ध्यान कर प्रणाम। ‘रं’ स्वरूप अग्निमण्डल को प्रणाम।
इस प्रकार यत्नपूर्वक पूजित दलों के मध्य में- विमला, उत्कर्षिणी, ज्ञाना, क्रिया,
योगा, प्रह्वी, सत्या और ईशाना' को पूर्व से प्रारम्भ कर प्रणाम। इसके बाद
अनुग्रहा को प्रणाम।
नमो भगवते तद्वद् विष्णवे तदनन्तरम्।
सर्वभूतात्मने चेति वासुदेवाय इत्यपि¹।।15।।
ततः सर्वात्मकायेति योगपीठात्मने नमः।।
प्रणवादिनमोऽन्ताय मन्त्रपीठात्मने नमः।।16।।
इसके बाद भगवान् विष्णु को प्रणाम। प्रत्येक प्राणी की आत्मा में
रहनेवाले वासुदेव को प्रणाम। तब सभी की आत्मा के स्वरूप योगपीठ स्वरूप
सिंहासन को प्रणाम। आदि में प्रणव (ॐकार) और अन्त में ‘नमः’ से युक्त मन्त्र
पीठस्वरूप को प्रणाम।
यजामहे स्वरामोँ ह्रीं आत्मना संव्यवस्थितौ।
नमोऽन्ताय रामाय ससीताय नमो नमः।।17।।
- घ. इत्यथ।
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