Skip to content
SarvaKosh
अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

by महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा

DevanagariSanskritpublished337 pages

Page 106 of 337

Read in context
Page 106

अष्टमोऽध्यायः (45)
— — — — — — — — — — — — — — —
क्षुद्राः¹ प्रलोभितास्तैस्तैर्निन्दितेभ्यो दिशन्ति ये।²
विनश्यत्येव तत्सर्वं सैकते शालिबीजवत् ।।२४।।
क्षुद्र बुद्धि वाले, प्रलोभन के फेर में पड़कर जो जो निन्दित कार्य के लिए
किसी को उकसाते हैं, उस गुरु का भी सबकुछ बालू की ढेर पर पड़े धान के बीज
के समान नष्ट हो जाता है
यैः शिष्यैः शश्वदाराध्याः गुरवो ह्यवमानिताः।
पुत्रमित्रकलत्रादिसंपद्भ्यः प्रच्युता हि ते।।२५।।
जो शिष्य बार बार अपने आराध्य गुरुओं का अपमान करते हैं, वे पुत्र,
मित्र, पत्नी और धन सम्पत्ति से विहीन हो जाते हैं।
अधिक्षिष्य गुरून् मोहात् परुषं प्रवदन्ति ये।
शूकरत्वं भवत्येव तेषां जन्मशतेष्वपि।।२६।।
गुरुओं पर आक्षेप लगाकर मूर्खतावश जो गुरु के प्रति कठोर वचन कहते
हैं, वे सौ जन्मों तक सूअर होते हैं।
ये गुरुद्रोहिणो मूढाः सततं पापकारिणः।
तेषां च यावत्सुकृतं दुष्कृतं स्यान्न संशयः।।२७।।
जो मूर्ख गुरु से द्रोह करते हुए हमेशा पापाचरण करते हैं उनके द्वारा किये
गये अच्छे कार्य भी बुरे फल देते हैं।
तारादिर्मुक्तये लक्ष्मीबीजादिर्भुक्तये तथा।
वाक्सिद्धये च वाग्बीजं प्रणवान्ते विनिक्षिपेत् ।।२८।।
मोक्ष के लिए पंचाक्षर मन्त्र (रामाय नमः) में तार (ॐकार) लगाकर,
सुख-सम्पत्ति के लिए लक्ष्मीबीज (श्रीं) लगाकर तथा वाणी की सिद्धि के लिए
वाग्बीज(ऐं) लगाकर प्रणव ॐकार अन्त में जोड़कर जपना चाहिए।
मान्मथं सर्ववश्याय पदं तत् त्रितयं पुनः।
तारान्ते चैव रामादौ सर्वार्थं विनियोजयेत् ।।२९।।
सर्ववशीकरण के लिए कामबीज (क्लीं) लगाकर तथा सर्वकामना सिद्धि के
लिए तीनों पदों ह्रीं, श्रीं, ऐं के बाद तार (ॐकार) लगाकर रामादि का जप करें।

  1. घ. क्षुब्धाः। 2. घ. निन्दितानादिशन्ति च।