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अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

by महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल)

DevanagariHindipublished423 pages

Page 15 of 423

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Page 15

न अध्यात्मरामायण


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तस्य पुण्यफलं वक्ष्ये शृणु वैष्णवसत्तम ।<br>प्रत्यक्षरं तु गायत्रीपुरश्चर्याफलं भवेत् ॥३७॥पुण्यका फल बतलाता हूँ, सुनो। उसे एक-एक अक्षर के पढ़नेमें गायत्रीके पुरश्चरणका फल मिलता है ॥३६-३७॥
उपवासव्रतं कृत्वा श्रीरामनवमीदिने ।<br>रात्रौ जागरितोऽध्यात्मरामायणमनन्यधीः।<br>यः पठेच्छृणुयाद्वापि तस्य पुण्यं वदाम्यहम् ॥३८॥जो पुरुष रामनवमीके दिन निराहार रहकर और फिर रात्रिको जागरण कर अनन्य बुद्धि-से अध्यात्मरामायणको पढ़ता या सुनता है, अब मैं उसका पुण्य बतलाता हूँ ॥३८॥
कुरुक्षेत्रादिनिखिलपुण्यतीर्थेष्वनेकंशः ।<br>आत्मतुल्यं धनं सूर्यग्रहणे सर्वतोमुखे ॥३९॥<br>विप्रेभ्यो व्यासुल्येभ्यो दत्त्वा यत्फलमश्नुते ।<br>तत्फलं सम्भवेत्तस्य सत्यं सत्यं न संशयः ॥४०॥कुरुक्षेत्रादि सम्पूर्ण पवित्र तीर्थोंमें सर्वग्रस्त सूर्यग्रहणके समय अनेकों बार व्यासजीके समान ब्राह्मणोंको अपने बराबर धन देनेसे जो फल होता है उसे वही फल मिलता है; इसमें कोई सन्देह नहीं, यह सर्वथा सत्य है, सर्वथा सत्य है ॥३९-४०॥
यो गायते मुदाऽध्यात्मरामायणमहर्निशम् ।<br>आज्ञां तस्य प्रतीक्षन्ते देवा इन्द्रपुरोगमाः ॥४१॥जो मनुष्य अहर्निश प्रसन्नचित्तसे अध्यात्मरामायणका गान करता है उसकी आज्ञाकी इन्द्रादि देवगण प्रतीक्षा किया करते हैं ॥४१॥
पठन्प्रत्यहमध्यात्मरामायणमनुव्रतः ।<br>यद्यत्करोति तत्कर्म ततः कोटिगुणं भवेत् ॥४२॥अध्यात्मरामायणका नित्यप्रति नियमपूर्वक पाठ करने-से मनुष्य जो कुछ पुण्य-कर्म करता है वह करोड़-गुना हो जाता है ॥४२॥
तत्र श्रीरामहृदयं यः पठेत्सुसमाहितः ।<br>स ब्रह्मघ्नोऽपि पूतात्मा त्रिभिरेव दिनैर्भवेत् ॥४३॥“इस (अध्यात्मरामायण) मेंसे जो पुरुष खूब समाहित होकर श्रीरामहृदयका पाठ करता है वह ब्रह्महत्यारा भी हो तो भी तीन दिनमें ही पवित्र हो जाता है ॥४३॥
श्रीरामहृदयं यस्तु हनूमत्प्रतिमान्तिके ।<br>त्रिः पठेत्प्रत्यहं मौनी स सर्वेप्सितभाग्भवेत् ॥४४॥जो पुरुष हनुमान्‌जीकी प्रतिमाके समीप प्रतिदिन तीन बार मौन होकर श्रीरामहृदयका पाठ करता है वह समस्त इच्छित फल प्राप्त करता है ॥४४॥
पठन् श्रीरामहृदयं तुलस्यश्वत्थयोर्यदि ।<br>प्रत्यक्षरं प्रकुर्वीत ब्रह्महत्यानिवर्तनम् ॥४५॥और यदि कोई पुरुष तुलसी या पीपलके निकट श्रीराम-हृदयका पाठ करे तो वह एक-एक अक्षरपर (अपनी) ब्रह्महत्या (जैसे पापों) को दूर कर देता है ॥४५॥
श्रीरामगीतामाहात्म्यं कृत्स्नं जानाति शङ्करः ।<br>तदर्धं गिरिजा वेत्ति तदर्धं वेद्म्यहं मुने ॥४६॥“हे मुने ! श्रीरामगीताका माहात्म्य पूरा-पूरा तो श्रीमहादेवजी ही जानते हैं; उनसे आधा पार्वतीजी जानती हैं और उनसे भी आधा मैं जानता हूँ ॥४६॥
तत्ते किञ्चित्प्रवक्ष्यामि कृत्स्नं वक्तुं न शक्यते ।<br>यज्ज्ञात्वा तत्क्षणालोकश्चित्तशुद्धिमवाप्नुयात्।४७।सो उसे पूरा कह भी नहीं सकता, उसमेंसे थोड़ा-सा तुम्हें सुनाता हूँ जिसके जाननेमात्रसे चित्त तत्काल शुद्ध हो जाता है ॥४७॥
श्रीरामगीता यत्पापं न नाशयति नारद ।<br>तन्न नश्यति तीर्थादौ लोके क्वापि कदाचन ।<br>तन्न पश्याम्यहं लोके मार्गमाणोऽपि सर्वदा ॥४८॥हे नारद ! जिस पापको श्रीरामगीताने नष्ट नहीं किया वह संसारमें कभी किसी तीर्थादिसे भी नष्ट नहीं हो सकता, मैं सदा ढूँढ़नेपर भी उस पापको नहीं देख पाता ॥४८॥
रामेणोपनिषत्सिन्धुमुन्मथ्योत्पादितां मुदा ।जिस गीतामृतको भगवान् रामने उपनिषत्सागरका