अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)
Adbhut Ramayana Hindi
by महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र)
Source: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (origin)
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (११७)
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (११७)
मुख फैलाये हुए वे महाबली सर्प रामके ही निकट धावमान हुए वह वासुकीके समान दीप्त भागवाले महाविषैले ॥ १७ ॥ दिशा विदिशाओंको सब ओरसे व्याप्त करते हुए, तब रामचन्द्र सब ओर सर्पोंको धावमान देखकर ॥ १८ ॥
सौपर्णमस्त्रं तद्घोरं पुनः प्रावर्तयद्रणे ॥ रामेण च शरा मुक्ता रुक्मपुंखाः शिलाशिताः ॥ १९ ॥ सुपर्णाः कांचना भूत्वा विचेरुः सर्पशत्रवः ॥ ते ताञ्छत्रुशराञ्जघ्नुः सर्परूपान्महाविषान् ॥ २० ॥
युद्धमें घोर गरुडास्त्रका स्मरण करते हुए, वे रामचन्द्रके सुवर्ण पुंखवाले बाण शिलापर पैनाये हुए ॥ १९ ॥ सुवर्णके गरुड होकर सब ओरसे सर्पशत्रु विचरने लगे उन्होंने रावणके महाविषैले सर्पोंका नाश कर दिया ॥ २० ॥
सुपर्णरूपा रामस्य विशिखाः कामरूपिणः ॥ अस्त्रे प्रतिहते क्रुद्धो रावणो राक्षसाधिपः ॥२१॥ अभ्यवर्षत्तदा रामं घोराभिश्चाश्मवृष्टिभिः ॥ ततः शरसहस्रेण पुनरक्लिष्टकारिणम् ॥ २२ ॥
शिखाहीन कामरूपी रामके बाणोंसे अस्त्र नष्ट होनेसे राक्षसराज रावण बडा क्रोधित हुआ ॥ २१ ॥ और रघुनाथजीके ऊपर घोर पत्थरकी वर्षा करने लगा, फिर सौ सहस्र बाणसे अक्लिष्ट कर्मकारी ॥ २२ ॥
रामबाणानभ्यहनद्घोराभिः शरवृष्टिभिः ॥ विषेदुर्देवगंधर्वाश्चारणाः पितरस्तथा ॥ २३ ॥ रामप्रार्तं तदा दृष्ट्वा सिद्धाश्च परमर्षयः ॥ रामचन्द्रमसं दृष्ट्वा ग्रस्तं रावण राहुणा ॥ २४ ॥
रामके बाणोंको घोर बाणवर्षासे नष्ट करने लगा । देव, गन्धर्व, चारण, पितर यह देखकर दुःखी हुए ॥ २३ ॥ रामचन्द्रको व्याकुल देखकर सिद्ध और परमर्षि ऐसे जानने लगे मानो चन्द्रको राहु ग्रास करता हो ॥ २४ ॥
प्राजापत्यं च नक्षत्रं रोहिणीं शशिनः प्रियाम् ॥ समाक्रम्य बुधस्तस्थौ प्रजाना महिते रतः ॥ २५ ॥ सधूमः परिवृत्तोर्मिः प्रज्वलन्निव सागरः ॥ उत्पपात ततः क्रुद्धः स्पृशन्निव दिवाकरम् ॥ २६ ॥
उस समय प्रजापतिका नक्षत्र चन्द्रमाकी प्रिया रोहिणीको आक्रमण कर बुध स्थित हुआ, इससे भी प्रजाका अहित होता है ॥ २५॥ समुद्र जलने सा लगा और धूम निकलने लगा तब वह रावण सूर्यको स्पर्श करते हुए के समान ऊपरको कूदा ॥ २६ ॥
( ११८ ) अद्भुतरामायण [ द्वाविंशो-
नष्टरूपश्च परुषो मंदरश्मिर्दिवाकरः॥अदृश्यत कबन्धांकः समेतो धूमकेतुना ॥ २७ ॥ ऋक्षाश्वरवनिर्घोषा गगने पुरुषाधमाः ॥ औत्पातिकानि नर्दतः समंतात्परिचक्रमुः ॥ २८ ॥
उस समय नष्टरूप पुरुष और मन्द किरणोंवाला सूर्य हो गया और धूमकेतुके सहित कबन्ध दीखने लगा ॥ २७ ॥ आकाशमें नक्षत्रोंका तीक्ष्ण शब्द होने लगा, सब ओरसे उत्पात दीखने लगे ॥ २८ ॥
रामोऽपि बद्ध्वा भ्रुकुटिं क्रोधसंरक्तलोचनः ॥ क्रोधं चकार सुभृशं निर्द्दहन्निव राक्षसम् ॥ २९ ॥ तस्य क्रुद्धस्य वदनं दृष्ट्वा रामस्य धीमतः ॥ सर्वभूतानि वित्रसुः प्राकंपत मही तदा ॥ ३० ॥
रामचन्द्रभी भौंह चढ़ाये क्रोधसे लालनेत्र किये राक्षसको जलाते हुएके समान क्रोध करते हुए ॥ २९ ॥ उन क्रोध किये रामचन्द्रका मुख देखकर सब भूत घबड़ा गये और पृथिवी कंपित होगई ॥ ३० ॥
सिंहशार्दूलमाच्छैलः प्रजज्वालाकुलद्रुमः ॥ बभूव चातिक्षुभितः समुद्र इव १पर्वसु ॥ ३१ ॥ लंकायां रावणवधे यं प्रायुंक्त शरं प्रभुः ॥ जग्राह तं शरं दीप्तं निःसंतमिवोरगम् ॥ ३२ ॥
सिंह शार्दूलके सहित पर्वत और कुलवृक्ष जल उठे और पर्वतमें सागरके समान समुद्र क्षुभित होगये ॥ ३१ ॥ लंकामें रावण वधके निमित्त जो बाण प्रभुने चलाया था, उसी बाणको श्वास लेते सर्पके समान ॥ ३२ ॥
यमस्मै प्रथमं प्रादादगस्त्यो भगवानृषिः ॥२ब्रह्मदत्तं महाबाणं यमाह युधि तद्वधे ॥ ३३ ॥ ब्रह्मणा निर्मितं पूर्णमिंद्राद्यैरमिततेजसा ॥ दत्तं सुरपतेः पूर्वं त्रैलोक्यजयकांक्षिणः ॥ ३४ ॥
प्रभुने ग्रहण किया, वह ब्रह्मदत्त महाबाण अगस्त्यजीने दिया था, युद्धमें उसके वधको ग्रहण किया ॥ ३३ ॥ वह महातेज द्वारा ब्रह्माका निर्माण किया था, इन्द्रादिके तेज उसमें विद्यमान थे, त्रिलोकी जयकी इच्छा करनेवाले इन्द्रके निमित्त वह बाण दिया गया था ॥ ३४ ॥
१ पर्वस्विवेतिसम्बन्धः । २ यं महाबाणं ब्रह्मदत्तं प्राहैत्यन्वयः । युधितद्वधनिमित्तं ब्रह्मणा निर्मितमिति