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अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

Adbhut Ramayana Hindi

by महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र)

Source: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (origin)

DevanagariHindipublished173 pages

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सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (४५)

गान करते हो तबही हमारी यह दशा होजाती है फिर जब तुम्बुरु गान करते हैं तब यह हमारे छिन्न भिन्न शरीर ॥ २७ ॥ तुम्बुरु गन्धर्वद्वारा जीवित होते हैं और हे नारद ! तुम मारते हो, यह देखकर नारदजी बड़े आश्चर्यको प्राप्त हुए ॥ २८ ॥

धिग्धिगुक्त्वा जगामाथ नारदोऽपि जनार्दनम् ।। श्वेतद्वीपे स भगवान्नारदं प्राह माधवः ।। २९ ।। गानबंधौ च यद्गानं न चैतेनासि पारगः ।। तुंबुरोः सदृशो नासि गानेगानेन नारद ।। ३० ।।

और अपने आपको धिक्कार देकर श्रीकृष्णके पास गये, तब श्वेतद्वीपमें भगवान्ने नारदजीसे कहा ॥ २९ ॥ कि गानवन्धुसे गाना सीखकर गान-विद्याके पारगामी नहीं हुए हो हे नारद ! गानविद्यामें अभी तुम तुम्बुरुके समान नहीं हुए हो ॥ ३० ॥

मनोर्वैवस्वतस्याहमष्टाविंशतिमे युगे ।। द्वापरांते भविष्यामि यदुवंशकुलोद्भवः ।। ३१ ।। देवक्यां वसुदेवस्य कृष्णनाम्ना महामुने ।। तदानीं मां समागम्य स्मारयेतद्यथातथम् ।। ३२ ।।

जब वैवस्वत मनुके अट्ठाईसवें युगमें द्वापरके अन्तमें यदुकुलमें मैं अवतार लूंगा ॥ ३१ ॥ देवकीवसुदेवसे जन्म लेनेसे कृष्ण मेरा नाम होगा उस समय तुम आकर हमें इस वातका स्मरण कराना ॥ ३२ ॥

तत्र त्वां गानसम्पन्नं करिष्यामि महाव्रत ।। तुंबुरोश्च समं चैव तथातिशयसंयुक्तम् ।। ३३ ।। तावत्कालं यथायोगं देवगंधर्वयोनिषु ।। शिक्ष त्वं हि यथान्यायमित्युक्त्वांतरधीयत ।। ३४ ।।

हे सुव्रत ! उस समय में तुमको गानसम्पन्न कर दूंगा और तुम्बुरुसे भी अधिक करदूंगा ॥ ३३ ॥ तबतक तुम यथायोग्य देवगन्धर्वकी योनिमें इसकी यथायोग्य शिक्षा करो, यह कह भगवान् अन्तर्धान होगये ॥ ३४ ॥

ततो मुनिः प्रणम्यैनं वीणावादन तत्परः ।। देवर्षिर्देवसंकाशः सर्वाभरणभूषितः ।। ३५ ।। तपसां निधिरत्यर्थं वासुदेवपरायणः ।। स्कंधे विपंचीमाधाय सर्वलोकांश्चचार सः ।। ३६ ।।

तब मुनि भगवान्को प्रणाम कर वीणा बजानेमें तत्पर हुए देवताओंके समान सम्पूर्ण आभरणोंसे भूषित ॥ ३५ ॥ तपोनिधि अत्यन्त वासुदेवपरायण कंधेके ऊपर वीणा धरे सब लोकोंमें विचरते थे ॥ ३६ ॥