अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)
Adbhut Ramayana Hindi
by महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र)
Source: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (origin)
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गवां कोटयर्बुदं चैव सुवर्णस्य तथैव च ।। वाससां रथनागानां
कन्या श्वानां तथैव च ।। ४९ ।। दत्त्वा स राजा विप्रेभ्यो मेदिनीं
पर्यपालयत् ।। न्यवारयत्स्वके राज्ये गानयोगेन केशवम् ।। ५० ।।
गौ करोडों, अरबों सुवर्ण, वस्त्र, रथ, नाग कन्या अश्व ।। ४९ ।। राजाने
ब्राह्मणोंको दिये पृथ्वीका पालन करता रहा औ गानयोगसे केशवको निवारण
किया ।। ५० ।।
अन्यं वा गानयोगेन गायेद्यदि स मे भवेत् ।। वध्यः सर्वात्मना
तस्माद्वेदैरीड्यः परः पुमान् ।। ५१ ।। न ब्राह्मणैश्च गातव्यं वह-
द्भिर्वेदमुत्तमम् ।। गानयोगेन सर्वत्र स्त्रियो गायंतु मां सदा ।। ५२ ।।
कि, जो कोई गान करेगा वह मेरे हाथसे वध्य होगा कारण कि, नारायणकी
स्तुति वेदवचनोंसे होती है ।। ५१ ।। वेदधारी ब्राह्मणोंको गान नहीं करना
चाहिये और गानयोगसे सर्वत्र स्त्रियें मुझको ज्ञान करें ।। ५२ ।।
सूतमागधसंघाश्च गीतं मे कारयन्तु वै ।। इत्याज्ञाप्य महातेजा
राज्यं वै पर्यपालयत् ।। ५३ ।। तस्य राज्ञः पुराभ्याशे हरिमित्र इति
स्मृतः ।। ब्राह्मणो विष्णुभक्तश्च सर्वद्वंद्वविवर्जितः ।। ५४ ।।
सूत मागधोंके सहित स्त्रीजन मेरे निमित्त गान करें इस प्रकार कहकर वह
महातेजस्वी राज्य करने लगा ।। ५३ ।। उस राजाके समीपमें एक हरिमित्र
था, जो ब्राह्मण विष्णुभक्त और सब द्वन्द्वसे वर्जित था ।। ५४ ।।
नदीपुलिनमासाद्य प्रतिमाञ्च हरेः शुभाम् ।। समभ्यर्च्य यथा-
शास्त्रं घृतदध्युत्तरं बहु ।। ५५ ।। मिष्टान्नं पायसं दत्त्वा हरेरावेद्य
धूपकम् ।। प्रणिपत्य यथान्यायं तत्र विन्यस्तमानसः ।। ५६ ।।
नदीके किनारे जाकर नारायणकी प्रतिमाको शास्त्रानुसार अर्चनकर
शास्त्रपूर्वक घृत दही आदिके सहित ।। ५५ ।। मिष्टान्न और खीर धूपादि
नारायणको निवेदन कर यथायोग्य प्रणाम कर उसमें मन लगाय ।। ५६ ।।
अगायत हरिं तत्र तालवीणालयान्वितम् ।। अतीव स्नेहसंयुक्त-
स्तद्गीतेनान्तरात्मना ।। ५७ ।। ततो राज्ञः समादेशा.दूटास्तस्य
समागताः ।। तदर्चनादि सकलं निर्धूय च समन्ततः ।। ५८ ।।