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अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

Adbhut Ramayana Hindi

by महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र)

Source: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (origin)

DevanagariHindipublished173 pages

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(१८) अद्भुतरामायण [ चतुर्थ-

मालामादाय तिष्ठन्ती तयोर्मध्ये समाहिता । पूर्ववत्पुरुषं दृष्ट्वा माल्ये तस्मै ददौ हि सा ॥ २५ ॥ अनंतरं च सा कन्या दृष्ट्वा न मनुजैः पुरः । ततो नादः समभवत्किमेतदिति विस्मयात् ॥ २६ ॥
सावधान हो उन दोनोंके बीचमें माला लेकर स्थित हुई और पूर्ववत् उस पुरुषको देखकर वह माला उसहीको पहरा दी ॥ २५ ॥ फिर उस कन्याको मनुष्योंने नहीं देखा तब यह क्या हुआ इस प्रकारका शब्द होने लगा ॥ २६ ॥

तामादाय गतो विष्णुः स्वस्थानं पुरुषोत्तमः । पुरा तदर्थमनिशं तपस्तप्त्वा वरांगना ॥ २७ ॥ श्रीमतीयं समुत्पन्ना सा गता च तथा हरिम् । तावुभौ मुनिशार्दूलौ धिक्त्वामित्येव दुःखितौ ॥ २८ ॥
उसको लेकर पुरुषोत्तम विष्णु भगवान् अपने स्थानको चले गये, पहले भगवान्के निमित्त बड़ा तप करके यह श्रेष्ठ स्त्री उत्पन्न हुई थी और नारायणको प्राप्त हुई और वह मुनिश्रेष्ठ परस्पर तुमको धिक्कार है इस प्रकार कहकर दुःखी हुए ॥ २७ ॥ २८ ॥

वासुदेवं प्रति सदा जग्मतुर्भवनं हरेः । तावागतौ समीक्ष्याह श्रीमतीं भगवान्हरिः ॥ २९ ॥ मुनि श्रेष्ठौ समायातौ गूढस्वात्मानमत्र वै । तथेत्युक्ता च सा देवी प्रहसंती चकार ह ॥ ३० ॥
और वासुदेवके स्थानको गये । उन दोनोंको आया देखकर भगवान्ने श्रीमतीसे कहा ॥ २९ ॥ दोनों मुनिश्रेष्ठ आते हैं, तू अपनी आत्मा को छिपा ले, यह कहनेपर वह देवी हँसकर रूप छिपाती भई ॥ ३० ॥

नारदः प्रणिपत्याग्रे प्राह दामोदरं हरिम् । किमिदं कृतवानद्य मम त्वं पर्वतस्य च ॥ ३१ ॥ त्वमेव नूनं गोविंद कन्यां तां हृतवानसि । तच्छ्रुत्वा पुरुषो विष्णुः पिधाय श्रोत्रमच्युतः ॥ ३२ ॥
तब नारदजी प्रणाम कर दामोदर हरिसे कहने लगे हे भगवन् ! आपने मेरा और पर्वतका यह क्या रूप कर दिया ॥ ३१ ॥ हे गोविन्द ! निश्चयही आपने उस कन्या का हरण किया है ! यह सुनकर पुरुषोत्तम अपने हाथ दोनों कानोंपर धरकर ॥ ३२ ॥

पाणिभ्यां प्राह भगवन्भवता किमुदीरितम् । कामवादो न भावोऽयं मुनिवृत्तेरहो किल ॥ ३३ ॥ एवमुक्तो मुनिः प्राह वासुदेवं स नारदः । कर्णमूले मम कथं गोलांगूलमुखं त्विति ॥ ३४ ॥