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अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

Adbhut Ramayana Hindi

by महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र)

Source: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (origin)

DevanagariHindipublished173 pages

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Page 19

(१२) अद्भुतरामायण [तृतीय-

त्वं च पर्वत मे वाक्यं शृणु वक्ष्यामि यत्प्रभो। कन्येयं युवयोरेकं
वरयिष्यति चेच्छुभा।।११।। तस्मै कन्यां प्रयच्छामि नान्यथा शक्ति
रस्ति मे ।तथेत्युक्त्वा तु तौ विप्रौ श्व आयास्याव ए हि ॥१२॥
हे पर्वतजी ! आप मेरे वचन श्रवण कीजिये मैं कहता हूँ तुम दोनोंमें यह
कन्या जिसका वरण करे ।। ११ ।। उसीको मैं दे दूंगा अन्यथा देनेकी मुझे
शक्ति नहीं है ! बहुत अच्छा यह कह दोनों ब्राह्मण दूसरे दिन आनेको
कहकर ।। १२ ।।

इत्युक्त्वा मुनिशार्दूलौ जग्मतुः प्रीतमानसौ । वासुदेवपरौ नित्य-
मुभौ ज्ञानवतां वरौ ।। १३ ।। विष्णुलोकं ततो गत्वा नारदो मुनिस-
त्तमः । प्रणिपत्य हृषीकेशं वाक्यमेतदुवाच ह ।। १४ ।।
प्रसन्नतासे चले गये यह दोनों ज्ञानी नित्य वासुदेवपरायण थे ।। १३ ।।
तब मुनिश्रेष्ठ नारदजी विष्णुलोकमें जाकर नारायणको प्रणाम कर इस
प्रकारके वचन बोले ।। १४ ।।

वृत्तान्तं सर्वमाख्याय नाथ नारायणव्यय । रहसि त्वां प्रवक्ष्यामि
नमस्ते भुवनेश्वर ।। १५ ।।ततः प्रहस्य गोविंदः सर्वात्मा कर्मठंमु-
निम् । ब्रूहीत्याह स विश्वात्मा मुनिराह च केशवम् ।। १६ ।।
और सब वृत्तान्त कथन करके बोले हे नारायण अविनाशी ! एकान्तमें
आपसे कुछ कहूंगा आपको प्रणाम है ।। १५ ।। तब सर्वात्मा गोविन्द हँसकर
उन कर्म करनेवाले मुनिसे बोले, कहिये तब यह केशव से बोले ।। १६ ।।

त्वदीयो नृपतिः श्रीमानंबरीषो महामतिः । तस्य कन्यां विशालाक्षी
श्रीमती नाम नामतः ।। १७ ।। परिणेतुमहं तां वा इच्छामि वचनं
शृणु । पर्वतोऽयं मुनिः श्रीमांस्तव भृत्यस्तपोनिधिः ।। १८ ।।
आपका भक्त एक अम्बरीष राजा है उसकी विशाल लोचनी श्रीमती कन्या
है ।। १७ ।। उससे मैं विवाह करनेकी इच्छा करता हूँ सो आप सुनिये यह
श्रीमान् पर्वत भी आपके बडे भक्त हैं ।। १८ ।।

तामैच्छत्सोऽपि भगवंस्तमाह च जनाधिपः ।। अंबरीषो महातेजाः
कन्येयं युवयोर्वरम् ।। १९ ।। लावण्ययुक्तं वृणुयाद्यदि तस्मै ददा-
म्यहम् । इत्याहावां नृपस्तत्र तथेत्युक्त्वाप्यहं ततः ।। २० ।।