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अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

Adbhut Ramayana Hindi

by महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र)

Source: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (origin)

DevanagariHindipublished173 pages

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(४) अद्भुतरामायण [ प्रथम-

रामः साक्षात्परं ज्योतिः परं धाम परः पुमान् ॥ आकृतौ परमो भेदो न सीतारामयोर्यतः ॥ १९ ॥ रामः सीता जानकी रामभद्रो नाणुर्भेदो नैतयोरस्ति कश्चित् । सन्तो बुद्ध्वा तत्त्वमेतद्विबुद्धाः पारं याताः संसृतेर्मृत्युवक्त्रात् ॥ २० ॥

राम साक्षात् परं ज्योति परंधाम परपुरुष हैं, मूर्तिमें सीतारामका कुछ भी भेद नहीं है ॥ १९ ॥ राम, सीता, जानकी, रामभद्र इनमें अणुमात्र भी भेद नहीं है सन्त इस तत्वको जानकर ज्ञानको प्राप्त होते हैं मृत्युके मुखजन्म मरणसे छूट तत्त्वज्ञानको प्राप्त होते हैं ॥ २० ॥

रामोऽर्चिन्त्यो नित्यचित्सर्वसाक्षी सर्वान्तः स्थः सर्वलोकैककर्ता । भर्त्ता हर्त्तानंदमूर्तिर्विभूमा सीतायोगाच्चिन्त्यते योगिभिःसः ॥ २१ ॥ अपाणिपादो जवनो ग्रहीता पश्यत्यचक्षुः स शृणोत्यकर्णः । स वेत्ति विश्वं नहि तस्य वेत्ता तमाहुरन्यं पुरुषं पुराणम् ॥ २२ ॥

राम अचिन्त्य, चित्स्वरूप सर्वके साक्षी सबके अंतःकरणमें स्थित सब लोकके एक कर्ता है, भर्त्ता हर्त्ता आनंदमूर्ति विभूमा सीताके योगसे जिनका चिंतन होता है ॥ २१ ॥ भौतिक चरण हस्तादिसे रहित होकर यह सर्वत्र व्याप्तरूप गमन और सर्वत्र ग्रहण करनेवाले हैं यह विश्वको जानते हैं परन्तु उनका जाननेवाला कोई नहीं है, उनको अन्य और पुराणपुरुष कहते हैं ॥२२॥

तयोः परं जन्म उदाहरिष्ये ययोर्यथाकारणदेहधारिणोः । अरूपिणो रूपविधारणं पुनर्नृणां महानुग्रह एव केवलम् ॥ २३ ॥ पठन् द्विजो वागॄषभत्वमीयात्क्षत्रान्वयो भूमिपतित्वमीयात् । वणिग्जनः पण्यफलत्वमीयाच्छृण्वन्हि शूद्रोहि महत्त्वमीयात् ॥ २४ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामयाणे वाल्मीकीये अद्भुतोत्तरकांडे आदिकाव्ये प्रथमः सर्गः ॥१॥

उन दोनोंके परम जन्मको कहूँगा, जिस कारण उन दोनोंने देह धारण किया है उन अरूपीका देह धारण करना केवल मनुष्योंके हितके ही निमित्त है ॥ २३ ॥ इसके पढनेसे ब्राह्मण श्रेष्ठवाणीको प्राप्त होता है क्षत्रिय पृथ्वीपति होता है, वैश्य पण्यफलको प्राप्त होता है, शूद्र सुनकर महत्त्वको प्राप्त होता है ॥ २४ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामयाणे वाल्मीकीये अद्भुतोत्तरकाण्डे आदिकाव्ये
पंडित–ज्वालाप्रसादजी मिश्रकृतभाषाटीकायां प्रथमः सर्गः ॥१॥