Skip to content
SarvaKosh
१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य

Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)

DevanagariSanskritpublished505 pages

Page 68 of 505

Read in context
Page 68

६८ कठोपनिषद्
रूप स्पष्ट नहीं दिखता है (क्योंकि प्राणियों को पूर्व जन्म की स्मृति रहने के कारण उनका सम्बन्ध पूर्व
सम्बन्धियों से बना रहता है)। गन्धर्व लोक में भी ब्रह्म का स्वरूप जल (की लहरों) के समान अस्पष्ट
दिखाई पड़ता है (क्योंकि वहाँ भोगों से लिप्त रहने के कारण ब्रह्म दर्शन ठीक से नहीं हो पाता); किन्तु
ब्रह्मलोक में छाया और धूप की भाँति आत्मा और परमात्मा का स्वरूप स्पष्ट परिलक्षित होता है ॥ ५॥
इन्द्रियाणां पृथग्भावमुदयास्तमयौ च यत् । पृथगुत्पद्यमानानां मत्वा धीरो न शोचति ॥
उदय और लय होते रहने के स्वभाव से युक्त अलग-अलग स्थानों में स्थित अनेक रूपों वाली
इन्द्रियों को जानने वाला ज्ञानी पुरुष कभी शोक नहीं करता ॥ ६ ॥
इन्द्रियेभ्यः परं मनो मनसः सत्त्वमुत्तमम् । सत्त्वादधि महानात्मा महतोऽव्यक्तमुत्तमम्।
इन्द्रियों से मन उत्तम है, मन से बुद्धि श्रेष्ठ है, बुद्धि से जीवात्मा उत्कृष्ट है और जीवात्मा की अपेक्षा
अव्यक्त शक्ति उत्तम है ॥ ७॥
अव्यक्तात्तु परः पुरुषो व्यापकोऽलिङ्ग एव च।
यं ज्ञात्वा मुच्यते जन्तुरमृतत्वं च गच्छति ॥ ८॥
अव्यक्त शक्ति (प्रकृति) से व्यापक और आकार रहित परम पुरुष परमात्मा श्रेष्ठ है, जिसको जानकर
जीवात्मा बन्धन से मुक्त हो जाता है और अमरत्व को प्राप्त होता है ॥ ८॥
न संदृशे तिष्ठति रूपमस्य न चक्षुषा पश्यति कश्चनैनम्।
हृदा मनीषी मनसाऽभिक्लृप्तो य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥ ९ ॥
इस ब्रह्म का यथार्थ रूप अपने समक्ष प्रकट नहीं होता। परमेश्वर के दिव्य स्वरूप को कोई इन चर्म-
चक्षुओं से नहीं देख सकता। मन को वश में करने वाली विवेक बुद्धि तथा सद्भाव सम्पन्न हृदय द्वारा
बारम्बार चिन्तन-मनन करने से ही उसका सम्यक् दर्शन हो सकता है। जो ब्रह्म को इस प्रकार जानते हैं,
वे अमृतत्व को प्राप्त करते हैं ॥ ९ ॥
यदा पञ्चावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह । बुद्धिश्च न विचेष्टति तामाहुः परमां गतिम् ॥
जब मन के साथ पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ (आत्मतत्त्व में) स्थिर हो जाती हैं और बुद्धि भी चेष्टारहित हो
जाती है, तब इस स्थिति को (जीवात्मा की) परमगति कहते हैं ॥ १० ॥
तां योगमिति मन्यन्ते स्थिरामिन्द्रियधारणाम् ।
अप्रमत्तस्तदा भवति योगो हि प्रभवाप्ययौ ॥ ११ ॥
इस प्रकार इन्द्रियों की स्थिर धारणा का नाम ही योग माना जाता है। उस समय साधक प्रमाद रहित
हो जाता है; किन्तु यह योग उदय और अस्त होने के स्वभाव से युक्त है (अतः परमात्मेच्छु को योग युक्त
रहने का दृढ़ अभ्यासी होना चाहिए) ॥ ११ ॥
नैव वाचा न मनसा प्राप्तुं शक्यो न चक्षुषा । अस्तीति ब्रुवतोऽन्यत्र कथं तदुपलभ्यते ॥१२॥
उस परमात्मा को न वाणी के द्वारा प्राप्त किया जा सकता है और न नेत्रों से। उसे मन के द्वारा भी नहीं प्राप्त
किया जा सकता है। 'वह ब्रह्म अवश्य है' ऐसा कहने मात्र से भला उसे कौन प्राप्त कर सकता है ? ॥ १२ ॥
अस्तीत्येवोपलब्धव्यस्तत्त्वभावेन चोभयोः।
अस्तीत्येवोपलब्धस्य तत्त्वभावः प्रसीदति ॥ १३ ॥