Skip to content
SarvaKosh
१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य

Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)

Report a copyright issue

DevanagariSanskritpublished505 pages

Page 476 of 505

Read in context
Page 476

बुरा, असाधु, असत्य आदि असत् के पर्यायवाची शब्द हैं। सत्य की ही सदैव जय होती है- सत्येनैव जयति
(मै०ब्रा०४.३.८)। सत्य में प्रमाद नहीं करना चाहिए-सत्यान्न प्रमदितव्यम् (तैत्ति०१.११.१)। इस लोक में सत् ही
परमेश्वर है। सत् के आधार पर ही सृष्टि और धर्म का अस्तित्व है। गीता में कहा है कि असत् का कोई अस्तित्व
नहीं है और सत् का अभाव नहीं है- नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः (गी०२.१६)। यज्ञ, तप और दान
की स्थिति सत् है- यज्ञे तपसि दाने च स्थितिः सदिति चोच्यते (गी०१७.२७)। सद्भाव और सज्जनता में 'सत्'
शब्द प्रयुक्त होता है-सद्भावे साधुभावे च सदित्येतत्प्रयुज्यते (गी०१७.२६)। मुण्डकोपनिषद् का प्रसिद्ध वाक्य,
जो सत्य के विजयी होने और असत्य के पराभूत होने का संकेत करता है, को भारत सरकार ने अपने राजचिह्न में
स्वीकार किया है- सत्यमेव जयते नानृतम्। सत्येन पन्था विततो देवयानः (मुण्ड०३.१.६)।
२३२. सत्त्व-रज-तम- सांख्य दर्शन के अनुसार समूची सृष्टि त्रिगुणात्मक है। ये तीन गुण हैं- सत्त्व, रज और तम।
सत्त्व सबसे उत्तम है, इसके लक्षण हैं-ज्ञान, शान्ति, विवेक, सत्प्रवृत्ति आदि। यह आत्म तत्त्व, मूल तत्त्व तथा चेतन
तत्त्व का भी बोधक है। वह परम पुरुष परमात्मा इन तीनों गुणों से परे है, अतः उसे त्रिगुणातीत भी कहा गया है।
सत्त्व, रज और तम ये तीनों गुण प्रकृति से उत्पन्न हुए हैं, ये अविनाशी जीवात्मा को शरीर में बाँधते हैं-सत्त्वं
रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसंभवाः। निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम् (गी०१४.५)। जब तक तीनों गुण
समान रूप से विद्यमान रहते हैं, तब तक प्रकृति में हलचल-परिवर्तन नहीं होता। प्रकृति मूलरूप में विद्यमान रहती
है-साम्यावस्था प्रकृतिः (सां०सू० १.६१)। गीता में ही आगे भगवान् ने वर्णन किया है कि सत्त्वगुण सुख में,
रजोगुण कर्म में और तमोगुण ज्ञान की ढँककर प्रमाद में लगाता है-सत्त्वं सुखे संजयति रजः कर्मणि भारत।
ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे संजयत्युत (गी०१४.९)। सत्त्व से ज्ञान, रज से लोभ तथा तम से प्रमाद, मोह, अज्ञान
उत्पन्न होता है-सत्त्वात्संजायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च। प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च (गी०१४.१७)।
२३३. सप्तचक्र- योग साधना ग्रन्थों में 'षट्चक्र वेधन' प्रक्रिया का प्रायः उल्लेख पाया जाता है। मान्यता है कि षट्चक्र
वेधन प्रक्रिया द्वारा कुण्डलिनी जागरण की क्रिया सम्पन्न होती है और वह जाग्रत् कुण्डलिनी ऊर्ध्वगमन करती हुई
सहस्रार स्थित शिवतत्त्व से जब मिल जाती है, तो योग (शिव-शक्तियोग) सिद्ध हो जाता है। साधक में अनेकानेक
चमत्कारिक शक्तियाँ विकसित हो जाती हैं और अन्त में वह मुक्ति का अधिकारी भी हो जाता है- षट्चक्राणि
परिज्ञात्वा प्रविशेत् सुखमण्डलम् (यो०शि०६.७४, यो०कु०३.९,१२), षट्चक्रं षोडशाधारं त्रिलक्ष्यं व्योम पञ्चकम्।
स्व देहे यो न जानाति तस्य सिद्धिः कथं भवेत् (यो०चू०३)। योग साधना ग्रन्थों में जिन षट्चक्रों की प्रसिद्धि
है, वे इस प्रकार हैं-१. मूलाधार, २.स्वाधिष्ठान, ३.मणिपूर, ४.अनाहत, ५.विशुद्धाख्य, ६.आज्ञाचक्र। इन षट्चक्रों के
वेधन की प्रक्रिया सम्पन्न होने के बाद इससे परे सातवें चक्र तक कुण्डलिनी शक्ति का ऊर्ध्वगमन होता है, तो साधक
पूर्णता की स्थिति में पहुँच जाता है। वह सातवाँ चक्र 'सहस्रार चक्र' है, जिसमें सहस्र दल कमल होने को बात
कही जाती है। इन सप्तचक्रों का विशद वर्णन तन्त्रसार, हठयोग प्रदीपिका जैसे योग साधना के ग्रन्थों में मिलता है।
२३४. सप्त जिह्वाएँ- यज्ञीय विधि-विधान के अन्तर्गत जहाँ अग्नि, समिधा, आज्य आदि का वर्णन पाया जाता है, वहीं
'अग्नि' का मानवीकरण (आधिदैविक) रूप भी प्राप्त होता है। 'अग्नि' जो उष्णता, ऊर्जा एवं प्रकाश आदि गुण
विशिष्ट पदार्थ के रूप में देखा जाता है, वहीं 'अग्निदेव' के रूप में भी प्रतिष्ठित है। सामान्य प्राणी जिस प्रकार मुख-
जिह्वा आदि अंगावयवों से युक्त हो भोजन आदि क्रियाएँ सम्पन्न करता है, उसी प्रकार अग्निदेव अपनी जिह्वाओं से
आज्य आदि हव्य सामग्रियों को ग्रहण करते हैं- ऐसी प्रसिद्धि है। यह अग्नि का आधिदैविक-आलंकारिक स्वरूप
है। 'अग्नि' की लपटें ही उसकी जिह्वाएँ हैं। पौराणिक ग्रन्थों के साथ ही उपनिषदों में भी अग्नि की सात जिह्वाओं
(ज्वालाओं) का वर्णन मिलता है। मुण्डकोपनिषद् (१.२.४) में कहा गया है- काली कराली च मनोजवा च,
सुलोहिता या च सुधूम्रवर्णा। स्फुलिंगिनी विश्वरुची च देवी लेलायमाना इति सप्त जिह्वाः ॥ अर्थात् काली,
कराली, मनोजवा, सुलोहिता, सुधूम्रवर्णा, स्फुलिंगिनी और विश्वरुची-ये उस (अग्नि) की लपलपाती हुई सात
जिह्वाएँ हैं। वस्तुतः ये जिह्वाएँ ही अग्नि की लपटें-ज्वालाएँ है। इनके नामों से लगता है कि ये लाल, धुएँ युक्त,
चिनगारी युक्त आदि गुण विशिष्ट अग्नि की लपटें हैं। इन्हें अग्निदेव की सात जिह्वाएँ कहा गया है। इसी को आगे सात
दीप्तियाँ भी कहा गया है- सप्तार्चिषः (मुण्ड०२.१.८)।