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१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य

Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)

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DevanagariSanskritpublished505 pages

Page 454 of 505

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Page 454

४६० [परिशिष्ट] पुरुषसूक्त

१२६. पितर — द्र०- पूर्वज।
१२७. पुत्रैषणा — द्र०- एषणा त्रय।
१२८. पुनर्जन्म — मृत्यु के बाद पुनः शरीर धारण करने को पुनर्जन्म कहा जाता है। गीता में कहा गया है कि जन्मने
वाले की मृत्यु सुनिश्चित है और मरने वाले का जन्म भी निश्चित है- जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च
(गी०२.२७)। जिस प्रकार मनुष्य पुराने वस्त्रों को छोड़कर दूसरे नये वस्त्रों को धारण करता है, वैसे ही देहधारी
(आत्मा) पुराने शरीर को छोड़कर दूसरे नये शरीरों को पाता है- वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति
नरोऽपराणि। तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही (गी०२.२२)। कर्मफल एवं आसक्ति
के अनुसार जीवात्मा को विविध योनियों में बार-बार जन्म-मरण चक्र में फँसना पड़ता है। विविध लोकों में
कर्मफल को भोगकर फिर उसे इसी लोक में पुनर्जन्म ग्रहण करना पड़ता है। गीता में भगवान् ने कहा है-हे अर्जुन !
ब्रह्मलोक तक सारे लोक पुनरावृत्ति वाले हैं, परंतु मुझको पाकर पुनर्जन्म नहीं होता- आब्रह्मभुवनाल्लोकाः
पुनरावर्तिनोऽर्जुन। मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते (गी०८.१६)।
१२९. पुराण — पुराण शब्द का सामान्य अर्थ है- पुरातन या प्राचीन। पुराणकालीन महात्माओं, राजाओं, देवों, पुरुषों के
वृत्तान्त जो परम्परागत रूप में चले आते हों; उन्हें भी पुराण कहते हैं। पुराण अट्ठारह हैं। पुराणों के नामों का संक्षिप्त
उल्लेख इस प्रकार है- मद्वयं भद्वयं चैव ब्रत्रयं वचतुष्टयम्। अनापलिंगकूस्कानि पुराणानि पृथक्-पृथक्
(दे०भा०१.३.२)। अर्थात् मद्वय (मत्स्य, मार्कण्डेय), भद्वय (भागवत, भविष्य), ब्रत्रय (ब्रह्म, ब्रह्मवैवर्त, ब्रह्माण्ड),
वचतुष्टय (वाराह, विष्णु, वामन, वायु), अनापलिंगकूस्क (अग्नि, नारद, पद्म, लिङ्ग, गरुड़, कूर्म और स्कन्द)
अट्ठारह पुराण कहे गये हैं। अट्ठारह उपपुराण भी प्रसिद्ध हैं। उनके नाम इस प्रकार हैं - सनत्कुमार, नृसिंह,
बृहन्नारदीय, शिव, दुर्वासा, कापिल, मानव, औशनस, वारुण, कालिका, साम्ब, नन्दिकेश्वर, सौर, पाराशर, आदित्य,
ब्रह्माण्ड, माहेश्वर, देवीभागवत। पुराणों के पाँच लक्षण माने गये है- सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशो मन्वंतराणि च।
वंशानुचरितं चैव पुराणं पंचलक्षणम् (ब्र० वै० पु० श्री कृष्ण जन्म० ४.१.३.७)। शिवपुराण के रेवा माहात्म्य में
वर्णन है कि अट्ठारह पुराणों के वक्ता सत्यवती व्यासदेव हैं। पुराण और स्मृति ग्रन्थ दोनों ही अठारह प्रसिद्ध हैं-
वायुपुत्र महाबाहो किं तत्त्वं ब्रह्मवादिनाम्। पुराणेष्वष्टादशसु स्मृतिष्वष्टादशस्वपि (रा०२० १.२)। परमात्मा
को सबसे प्राचीन होने के कारण पुराण पुरुष कहा गया है, वह सबकी हृदय गुहा में संव्यास होकर छिपा हुआ है-
तं दुर्दर्शं गूढमनुप्रविष्टं गुहाहितं गहरेष्ठं पुराणम् (कठ० १.२.१२)।
१३०. पुरुष-परम पुरुष — 'पुरुष' शब्द की व्युत्पत्ति 'पुरि शेते इति' (पुर अर्थात् शरीर में शयन करता है) की गयी
है। इस अर्थ में प्रत्येक व्यक्ति पुरुष है, वह चाहे स्त्री हो अथवा पुरुष। वह दिव्य पुरुष-परम पुरुष प्राणियों की देह
के मध्य भाग में अवस्थित रहता है। वह अङ्गुष्ठमात्र परिमाण का पुरुष धूम्ररहित ज्योतिरूप में स्थित रहता है-
अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो मध्य आत्मनि तिष्ठति। अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो ज्योतिरिवाधूमकः (कठ०२.१.१२-१३)। अव्यक्त
शक्ति (प्रकृति) से श्रेष्ठ वह परम पुरुष अत्यन्त व्यापक और आकाररहित है, जिसे जानकर जीव बन्धनमुक्त होकर
अमरत्व को प्राप्त करता है- अव्यक्तात्तु परः पुरुषो व्यापकोऽलिङ्ग एव च। यं ज्ञात्वा मुच्यते जन्तुरमृतत्वं च
गच्छति (कठ०२.३.८)। वही परम पुरुष तीन रूपों में प्रकट हुआ-आत्मा, अन्तरात्मा (जीवात्मा) और परमात्मा
कहलाता है- त्रिविधः पुरुषोऽजायत ऽऽत्माऽन्तरात्मा परमात्मा चेति (आत्मो०१)। वह विराट् स्वरूप आदित्य
के सदृश प्रकाशस्वरूप है- वेदाहमेतं पुरुषं महान्तमादित्यवर्णं तमसः परस्तात् (श्वेता०३.८)। वह पुरुष सोलह
कलाओं से युक्त है- षोडशकलः सोम्य पुरुषः (छान्दो०६.७.१)। वह दिव्य पुरुष यज्ञरूप है, संकल्परूप है-
पुरुषो वाव यज्ञः (छान्दो०३.१६.१), अथ खलु क्रतुमयः पुरुषः (छान्दो०३.१४.१)। वह पुरुष अविनाशी और
अमृतस्वरूप आत्मारूप है- यत्रामृतः स पुरुषो ह्यव्ययात्मा (मुण्ड०१.२.११)। ऋग्वेद के पुरुष सूक्त (१०.९०)
में आदि पुरुष की कल्पना विराट् पुरुष अथवा विश्वपुरुष के रूप में की गयी है।
१३१. पुरुषसूक्त — ऋग्वेद के दसवें मण्डल के नब्बेवें सूक्त को अथवा यजुर्वेद के ३१ वें अध्याय के १६ मन्त्रों के
समूह को जिसका प्रारम्भ 'सहस्रशीर्षा' से होता है, पुरुष सूक्त कहते हैं। इसमें विराट् नारायण पुरुष की स्तुति की