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१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य

Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)

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DevanagariSanskritpublished505 pages

Page 425 of 505

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Page 425

परिशिष्ट-१
परिभाषा कोश-१०८ उपनिषद् (ज्ञानखण्ड)
१. अक्षर ब्रह्म - वेदान्त दर्शन में 'ब्रह्म' की अवधारणा उस परमसत्ता के रूप में है, जो सर्वातिशायी, सर्वसमर्थ,
सर्वत्र विद्यमान रहने वाली सर्वोच्च शक्ति है। उस 'परब्रह्म' को अनेक नामों से अभिहित किया गया है- परमात्मा,
परमेश्वर, ब्रह्म, भूमा, परमचैतन्य, अक्षरब्रह्म (ओंकार) इत्यादि। परब्रह्म का अक्षरात्मक स्वरूप 'ओंकार' 'प्रणव'
के रूप में उपनिषदादिक आर्ष ग्रन्थों में सर्वत्र प्राप्त होता है। तात्त्विक दृष्टि से देखा जाय, तो 'ब्रह्म' अक्षर ही है,
'न क्षरति इति अक्षरः' जिसका क्षरण-विनाश नहीं होता है, वह 'अक्षर' है। इस दृष्टि से 'अक्षर' शब्द ब्रह्म की
विशिष्टता का बोधक हुआ। वैसे अक्षरात्मक-वर्णात्मक ब्रह्म के रूप में 'ॐ' प्रणव को स्वीकार किया जाता है,
जैसे- अक्षरं परमं पदम् (महाना० ११.१), अक्षरं परमं ब्रह्म निर्विशेषं निरंजनम् (१ यो०शि० ३.१६), अक्षरं
ब्रह्मपरमं (गी० ८.३), अक्षरोऽहमोङ्कारोऽमरोऽभयोऽमृतो ब्रह्माभयं हि वै (गो० उ० ४०)। इन उद्धरणों को
देखने से प्रतीत होता है कि अक्षर ब्रह्म-ओंकार-प्रणव-आत्मा आदि सभी एक ही तत्त्व के प्रतिपादक हैं। अक्षर
ब्रह्म का विशद विवेचन माण्डूक्य उपनिषद् तथा गौड़पादकृत माण्डूक्य कारिका में उपलब्ध है।
२. अग्नि- वैदिक संहिताओं और ब्राह्मण ग्रन्थों में देवतारूप में अग्नि का महत्त्वपूर्ण स्थान है। यह तीनों लोकों
में प्रमुखतः तीन रूपों में है- आकाश में सूर्य, अन्तरिक्ष में विद्युत् और पृथ्वी पर साधारण अग्नि। ऋग्वेद में सबसे
अधिक सूक्त अग्नि देवता की स्तुति में ही संगृहीत हैं। अग्नि की गृहपति कहा गया है और परिवार के सभी सदस्यों
से उसका घनिष्ठ सम्बन्ध है (ऋ० २.१.९)। अग्नि को दिव्य पुरोहित भी कहा गया है- अग्निमीळे पुरोहितम् (ऋ०
१.१.१)। अग्नि सर्वदर्शी है, वह मनुष्य के सब कर्मों को देखता है- (ऋ० १०.७९.५)। अग्नि को प्रमुख रूप से
तीन रूपों में अभिहित किया गया है- १. गार्हपत्य २. दक्षिणाग्नि ३. आहवनीय। मीमांसा सूत्र में जैमिनि ने अग्नि
के छः रूप वर्णित किये हैं- गार्हपत्य २. आहवनीय, ३. दक्षिणाग्नि ४. सभ्य ५. आवसथ्य और ६. औपासन। अग्नि
और आदित्य दोनों को भर्ग भी कहा गया है-अग्निर्वै भर्गः। आदित्यो वै भर्गः (जैमि० ४.२८.२)।
३. अङ्गिरस् - द्र० - अथर्वा ।
४. अङ्गुष्ठमात्र - मनुष्य को हृदय गुहा में वह परमात्मा आत्मा रूप में अंगुष्ठमात्र परिमाण वाला या अँगूठे जैसा
समाविष्ट है। यही तथ्य उपनिषद् से भी प्रमाणित होता है- अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषोऽन्तरात्मा सदा जनानां हृदये
संन्निविष्टः (कठ० २.३.१७), अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो मध्य आत्मनि तिष्ठति (कठ० २.१.१२)। यह परमात्मा हृदय में
अङ्गुष्ठमात्र परिमाण वाली धूमरहित ज्योति के रूप में है- अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो ज्योतिरिवाधूमकः (कठ० २.१.१३)।
यह ज्योति सूर्य के समान प्रकाशमय और सङ्कल्प तथा अहंकार से युक्त है-अङ्गुष्ठमात्रो रवितुल्यरूपः
सङ्कल्पाहंकारसमन्वितो यः (श्वेता० ५.८)।
५. अज - अज का शब्दार्थ है - जिसका जन्म न हो, जन्म के बन्धन से रहित। अजन्मा, स्वयंभू, ब्रह्मा, विष्णु,
महेश, ईश्वर और कामदेव को भी अज कहकर निरूपित किया जाता है। मानस में ब्रह्म को अज कहा गया है- ब्रह्म
जो व्यापक विरज, अज, अकल, अनीह, अभेद (रा०मा० १.५०)। जीव तथा माया को भी 'अज' रूप में माना गया
है। महाभारत में अज के विषय में कहा गया है-नहि जातो न जायेयं न जनिष्ये कदाचन। क्षेत्रज्ञः सर्वभूतानां
तस्मादहमजः स्मृतः ॥ (महा० शान्ति० ३४२. ७४) अर्थात् मैं न उत्पन्न हुआ हूँ, न होता हूँ और न होऊँगा। सब
प्राणियों का मैं क्षेत्रज्ञ हूँ, इसीलिए लोग मुझे अज कहते हैं। अनादि प्रकृति को भी अज कहा गया है। उपनिषद् के
अनुसार बहुत से प्राणियों को त्रिगुणात्मक रचने वाली लाल, कृष्ण, सफेद रंग को एक अजन्मा प्रकृति को एक
अज (अज्ञानी जीव) आसक्त होकर भोगता है और दूसरा अज (ज्ञानी पुरुष) भुक्त प्रकृति को त्याग देता है-
अजामेकां लोहितशुक्लकृष्णां बह्वीः प्रजाः सृजमानां सरूपाः।
अजो ह्येको जुषमाणोऽनुशेते जहात्येनां भुक्तभोगामजोऽन्यः ॥ (श्वेता० ४.५)।