१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य
Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)
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जिस प्रकार प्रवहमान नदियाँ अपने नाम-रूप को छोड़कर समुद्र में विलीन हो जाती हैं, वैसे ही ज्ञानी
पुरुष नाम रूप से विमुक्त होकर उत्तमोत्तम दिव्य पुरुष को समर्पित हो जाते हैं ॥ ८ ॥
स यो ह वै तत्परमं ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति नास्याब्रह्मवित्कुले भवति। तरति शोकं
तरति पाप्मानं गुहाग्रन्थिभ्यो विमुक्तोऽमृतो भवति ॥ ९ ॥
जो विद्वान् पुरुष उस परब्रह्म को जान लेता है, वह ब्रह्मरूप ही हो जाता है। उसके कुल में कोई ज्ञान
से रहित नहीं होता। वह पापों से पार होकर शोक-संतापों से भी पार हो जाता है। हृदय ग्रन्थियों
(आन्तरिक विकारों) से विमुक्त होकर अमरत्व को प्राप्त होता है ॥ ९ ॥
तदेतदृचाऽभ्युक्तम्-क्रियावन्तः श्रोत्रिया ब्रह्मनिष्ठाः स्वयं जुह्वत एकर्षिं श्रद्दधन्तः।
तेषामेवैतां ब्रह्मविद्यां वदेत शिरोव्रतं विधिवद्यैस्तु चीर्णम् ॥ १० ॥
यही बात (ब्रह्मविद्या के विषय में) ऋचा में कही गयी है-
जो निष्काम भाव से कर्म करने वाले, वेद-शास्त्रों के ज्ञाता, ब्रह्म के उपासक और एकर्षि नामक अग्नि
में स्वयं श्रद्धापूर्वक हवन करने वाले हैं तथा जिन्होंने विधिपूर्वक सर्वश्रेष्ठ व्रत का पालन किया है, उन्हीं से
यह ब्रह्मविद्या कहनी चाहिए ॥ १० ॥
तदेतत्सत्यमृषिरङ्गिराः पुरोवाच नैतदचीर्णव्रतोऽधीते। नमः परमऋषिभ्यो नमः
परमऋषिभ्यः ॥ ११ ॥
उस ब्रह्म के इस सत्य को प्रथम अङ्गिरा ऋषि ने प्रकट किया था। जिसने ब्रह्मचर्य व्रत का पालन नहीं
किया, वह इसे नहीं जान सकता। उन ब्रह्मज्ञानी पुरुषों को बारम्बार नमस्कार है ॥ ११ ॥
॥ शान्तिपाठः ॥
ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम.....। स्वस्ति नऽइन्द्रो वृद्धश्रवाः ......... इति शान्तिः ॥
॥ इति मुण्डकोपनिषत्समाप्ता ॥