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१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य

Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)

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DevanagariSanskritpublished505 pages

Page 372 of 505

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Page 372

३७२ मुण्डकोपनिषद्
सूक्ष्मातिसूक्ष्म रूप में प्रकाशित होता है। वह अत्यन्त दूर से भी अतिदूर है तथा निकट से निकटस्थ भी है।
वह सूक्ष्म द्रष्टाओं की दृष्टि में प्रत्येक प्राणी के अन्दर हृदयगुहा में प्रतिष्ठित है ॥ ७ ॥
न चक्षुषा गृह्यते नापि वाचा नान्यैर्देवैस्तपसा कर्मणा वा।
ज्ञानप्रसादेन विशुद्धसत्त्वस्ततस्तु तं पश्यते निष्कलं ध्यायमानः ॥ ८ ॥
वह ब्रह्म (अथवा आत्मा) न नेत्रों से ग्रहण किया जाता है, न वाणी से, न अन्य इन्द्रियों से ग्रहणीय
है, वह तप से अथवा कर्मों से भी ग्रहणीय नहीं है। ज्ञान प्रसाद से ज्ञानी शुद्ध अन्तःकरण वाला होता है,
तब वह ध्यान के द्वारा कलारहित परमात्मा को देखता है ॥ ८ ॥
एषोऽणुरात्मा चेतसा वेदितव्यो यस्मिन्प्राणः पञ्चधा संविवेश।
प्राणैश्चित्तं सर्वमोतं प्रजानां यस्मिन्विशुद्धे विभवत्येष आत्मा ॥ ९ ॥
वह सूक्ष्म आत्मा मन के द्वारा जानने योग्य है, जिसमें देह से सम्बद्ध पाँच रूपों वाला प्राण
स्थित है। इन्हीं प्राणों से सम्पूर्ण प्रजाओं का मन भी व्याप्त है, जिसके शुद्ध हो जाने पर यह आत्मा
प्रकाशित होने लगता है ॥ ९ ॥
यं यं लोकं मनसा संविभाति विशुद्धसत्त्वः कामयते यांश्च कामान्।
तं तं लोकं जयते तांश्च कामांस्तस्मादात्मज्ञं ह्यर्चयेद्भूतिकामः ॥ १० ॥
निर्मल अन्तःकरण वाला आत्मज्ञानी जिस-जिस लोक का मन से चिन्तन करता है, जिन कामनाओं
को चाहता है, वह उस-उस लोक को और उन कामनाओं को प्राप्त कर लेता है, अतः ऐश्वर्यादि की इच्छा
करने वाला मनुष्य आत्मज्ञानी का अर्चन करे ॥ १० ॥
[ यहाँ एक महत्त्वपूर्ण मर्म प्रकट किया गया है। लौकिक कामनाग्रस्त मनुष्य तमाम पुरुषार्थ करके इच्छित
वस्तुओं का संग्रह करने के बाद जो सुख अनुभव करता है, निर्मल अन्तःकरण वाले को वह सुखानुभूति संकल्प
मात्र से हो जाती है। इसलिए ऐश्वर्य संग्रह पूर्वक सन्तोष खोजने वालों के लिए भी यही उचित है कि वे आत्मज्ञानी
को श्रेष्ठ मानकर उनका अनुगमन करें।]
॥ द्वितीयः खण्डः ॥
स वेदैतत्परमं ब्रह्म धाम यत्र विश्वं निहितं भाति शुभ्रम्।
उपासते पुरुषं ह्यकामास्ते शुक्रमेतदतिवर्तन्ति धीराः ॥ १ ॥
आत्मज्ञानी साधक उस निर्मल और ज्योतिर्मय ब्रह्म के परमधाम को जान लेता है, जिसमें यह सम्पूर्ण
विश्व समाहित है। जो साधक निष्काम भाव से परमेश्वर की उपासना करते हैं, वे विवेकी पुरुष इस शरीर
के जन्म-चक्र (देह के बन्धन) को लाँघ जाते हैं ॥ १ ॥
कामान्यः कामयते मन्यमानः स कामभिर्जायते तत्र तत्र ।
पर्याप्तकामस्य कृतात्मनस्तु इहैव सर्वे प्रविलीयन्ति कामाः ॥ २ ॥
जो कामनाओं को मन में रखते हुए उनकी पूर्ति चाहता है, वह उनकी पूर्ति के कारण वहाँ-वहाँ
उत्पन्न होता रहता है। परन्तु जो कामनाओं से पूर्णतया तृष्ट हो चुके हैं, उस कृतार्थ हुए पुरुष की सभी
कामनाएँ इस शरीर में (शरीर के साथ ही) विलीन हो जाती हैं ॥ २ ॥